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मज़हब ने ही है छीना प्यारा चमन हमारा

मज़हब ने ही है छीना प्यारा चमन हमारा ।
मज़हब ने ही है लूटा गंग ओ जमन हमारा।
मज़हब से बाहर आये बिना होना नहीं उबारा।
मज़हब ने ही किया है धरती मैया का कबाड़ा।

कॊई हिंदू, कॊई मुसलमान तॊ कॊई है यहुदी,
कॊई सिख, कॊई ईसाई, पर किसी में न बेखुदी,
मज़हब ही है सिखाता इनकॊ लड़ना लड़ाना,
मज़हब ने ही किया है धरती मैया का कबाड़ा।

सब कहते’ बस हम सच्चे, बाकी सब झूठे हैं,
पता नहीं कब से इनसे ईश्वर अल्लाह रूठे हैं,
इनके अनाचार ने किया है सत्य नाश हमारा
मज़हब ने ही किया है धरती मैया का कबाड़ा।

कहीं दलित, कहीं नास्तिक, कही काफ़िर बनाया,
मजहब ने मानव कॊ हर दम से शैतान बनाया,
अनगिनत को मारा है, अनंत को है उजाड़ा
मज़हब ने ही किया है धरती मैया का कबाड़ा।

कहीं पंडित, कहीं मुल्ला, कहीं पादरी का राज है,
सब के सुरॊं में बज रहा इक शैतान का साज है
सहज सनेह के रिश्ते को सबने मिल बिगाड़ा,
मज़हब ने ही किया है धरती मैया का कबाड़ा।

साथ खाना, साथ पीना, साथ रहना सोना,
इनके होते इस जगत में कभी नहीं है होना,
इन्हॊंने ही इंसां के दिल से प्रेम पौध उखाड़ा।
मज़हब ने ही किया है धरती मैया का कबाड़ा।

अब तो हम आगे बढ़ इनके केंचुल कॊ छॊड़ दें,
इक नया संसार बना, इनके पिंजड़ॆ को तोड़ दें
सूरज, चंदा, तारे भी आकुल देने को हमें सहारा,
मज़हब ने ही किया है धरती मैया का कबाड़ा।

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