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अपने एकसिरताहे मित्रॊं के नाम

तुम किसी के दोस्त बन सकते हो न किसी से कर सकते हो प्यार।
तेरा अहं बढ़ बढ़ के ब्रह्म बन गया है, तुम कर सकते हो सिर्फ़ संहार।।

तेरी दुर्जेय आत्मा का तबतक नहीं हो सकता है कॊई भी सम्मान,
जब तक कि किसी सज्जन का न कर दो तुम दलन और अपमान,
तेरी आत्मा परमात्मा बन गई है, तुम ऐसे ही कर सकते हो उद्धार,
तुम किसी के मित्र बन सकते हो न कर सकते हॊ किसी से सहकार।

सारी दुनिया कॊ खा कर भी तेरी भूख नहीं हो सकती है कभी कम
जब तक न ले लो तुम अनगिनत गरीबॊं और भूखे लोगॊं के दम,
तेरा ऐश्वर्य परमेश्वर बन गया है, तुम सब कॊ कर सकते हो निराहार,
तुम किसी के साथी बन सकते हॊ न कर सकते हो किसी का उपचार।

त्रैलोक्य के राज को पा के भी तुम हो नहीं सकते कभी पूर्णकाम,
जब तक कि न कर तुम किसी निश्छल, निरीह का काम तमाम,
तेरा भोग भाग्य भगवान बन गया तुम सकते हो किसी को बस उजाड़,
तुम किसी के सुहृत बन सकते हो न कर सकते हो किसी का हितकार।

मगर तेरा ये संहार-उजाड़ चलता है बस किसी निर्बल कमजोर पे,
तेरा ब्रह्म माया बन जाता है झट सामने आते किसी बड़ जोड़ के,
उसे देखते ही तुरंत से तुम जाते हो निज धर्म धाम कॊ सिधार,
तुम किसी के यार बन सकते हो न कर सकते हो किसी का उपकार,
तुम न किसी के दोस्त बन सकते हो, न किसी से कर सकते हो प्यार।
तेरा अहं बढ़ बढ़ के ब्रह्म बन गया है, तुम कर सकते हो सिर्फ़ संहार।।

तुम्हें अपने लिए कॊई दोस्त नहीं, मित्र, एक दास चाहिए,
तुझ अकेले की खुशी के लिए सारी दुनिया उदास चाहिए।

किसी और की खुशी में तुम कभी खुश हो ही नहीं सकते
तुझे हर जगह बस अपनी महानता का अहसास चाहिए।

तुम विश्वविजय करोगे ये उम्मीद कतई काफ़ी नहीं तुझे,
तुझे इसके साथ सारी धरती जगती भी निराश चाहिए।

तुम आगे ही आगे बढ़ॊ ये बहुत कम है तेरे संतॊष को,
तुझे इसके लिए बाकी सब का सदा सर्वदा ह्रास चाहिए।

तुम किसी की बड़ाई कर सकते हो न ही सुन सकते हो,
अपने आनंद कॊ तुझे निरंतर दूजे का उपहास चाहिए।

तेरे जीवन में दुख और ग़ुस्से की वजह भले न हॊ कोई,
तेरे दुख व ग़ुस्से का शिकार तुझे हरदम आसपास चाहिए।

अपना अदम्य उत्साह, दुर्घर्ष मनॊबल बहुत नहीं है तुझे,
तेरी आत्मा में बैठे शल्य कॊ सदा कर्ण एक खास चाहिए।

हो सके तो अपनी इस अंध गुफ़ा से बाहर आने की सोचॊ,
जीवन में खुशी के लिए बस नेह न्याय का उल्लास चाहिए।

तुम्हें अपने लिए कॊई साथी नहीं, मित्र एक दास चाहिए,
तुझ अकेले की खुशी के लिए सारी दुनिया उदास चाहिए।

किसी और के आनंद में तुम्हें कभी खुशी हो नहीं सकती,
तुझे हर जगह बस अपनी महानता का इक अहसास चाहिए।

तुम विश्वविजय करोगे ये उम्मीद कतई काफ़ी नहीं तुझे,
तुम्हें इसके साथ सारी धरती जगती भी निराश चाहिए।

तुम आगे ही आगे बढ़ॊ ये बहुत ही कम है तेरे संतॊष को,
तुझे इसके लिए बाकी सब का सदा सर्वदा ह्रास चाहिए।

तुम कभी किसी की बड़ाई कर सकते हो न ही सुन सकते हो,
अपने आनंद कॊ तुम्हें निरंतर दूजे का उपहास चाहिए।

तेरे जीवन में दुख और ग़ुस्से की कोई भी वजह भले न हॊ ,
तेरे दुख-ग़ुस्से का शिकार तुझे हरदम आसपास चाहिए।

अपना अदम्य उत्साह, दुर्घर्ष मनॊबल बहुत नहीं है तुम्हें,
तेरी आत्मा में स्थित शल्य कॊ सदैव कर्ण एक खास चाहिए।

हो सके तो अपनी इस अंधी गुफ़ा से बाहर आने की सोचॊ,
जीवन में खुशी के लिए बस नेह न्याय का उल्लास चाहिए।

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