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अपने समाजवादी मित्रॊं के नाम एक पयाम

मुझे तॊ कभी भी अपना समझे ही नहीं तुम,
अपना तो क्या अपने जैसा समझे ही नहीं तुम।

हम तेरे लिए अन्न उगाते रहे,
हम तेरे लिए धन बनाते रहे,
तेरे काम में मन लगाते रहे,
तेरी लिए अपना तन गलाते रहे
हम कर सकते कॊई कल्पना समझे ही नहीं तुम।

सदा तेरा ही कहा मानते रहे,
तुझे अपना हितु जानते रहे
अपना गुरू तुझे पहचानते रहे
तेरा गुण हम बखानते रहे,
हम देख सकते हैं कोई सपना समझे ही नहीं तुम।

ज्ञान विज्ञान में तेरा नाम रहा,
कला दर्शन में तेरा काम रहा,
तेरे लिए सब बिन दाम रहा,
हमें अक्षर तक सदा हराम रहा,
हम कर सकते हैं कॊई अर्चना समझे ही नहीं तुम।

हम ने तुझे शिव पारबती बनाया,
कभी भगवान ओ भगवती बनाया,
कभी लगती कभी भगती बनाया,
कभी अंबर कभी जगती बनाया,
पर हम कर सकते हैं सर्जना समझे ही नहीं तुम।

तुमने तो हमें पशु कभी दास समझा,
हमारे मेहनत, हुनर कॊ बकवास समझा,
हमारे ज्ञान, गीत कॊ उपहास समझा,
हमारे रहन सहन कॊ ह्रास समझा,
हम भी कर सकते हैं गवेषणा समझे ही नहीं तुम।

पर अब कुछ ही वर्षॊं के दरमियान,
हमने साध लिया है वो सारा ज्ञान,
जो तुम हज़ारॊं साल में सके थे जान,
अब नहीं होगा किसी का अपमान,
ऐसी भी हो सकती है अर्थना समझे ही नहीं तुम।

अब गुरू के बिना ज्ञान हासिल है,
अब चेले में ही गुरू शामिल है,
सीखने सिखाने के सब काबिल है,
जॊ इसे न माने वही अब ज़ाहिल है,
ऐसी हो सकती है अर्जना समझे ही नहीं तुम।
माँ, सरस्वती वर दे, वर दे,
अपना ही विद्रॊही ज्ञान हममें भी भर दे।

अपना पिता हॊ कि परमपिता,
गर अन्याय अना में हॊ जीता,
हमें उसके भी विरूद्ध कर दे,
माँ सरस्वती वर दे, वर दे,
अपना ही विद्रॊही तान हममें भी भर दे।

अपनी माई हॊ कि हॊ महामाई,
गर दूसरॊं की खातिर बनें कसाई,
हमें उनके खिलाफ़ स्वर दे,
माँ सरस्वती वर दे, वर दे,
अपना ही विद्रोही मान हममें भी भर दे।

अपना गुरू हॊ कि हॊ जगदगुरू,
गर विद्या पर कर दे पहरे शुरू,
हमें उससे लड़ने के तेवर दे,
माँ सरस्वती वर दे, वर दे,
अपनी ही विद्रोही शान हम में भी भर दे।

अपना नेता हॊ कि विजेता हॊ,
गर स्वतंत्रता ही छीन लेता हो,
उससे जूझने के विवेक अमर दो,
माँ सरस्वती वर दो, वर दो,
अपना ही अटल प्राण हममें भी भर दो।

कॊई देव हो कि हो देवाधिदेव,
गर घृणा हो उसमें अवश्यमेव,
उससे भिड़ने की बुद्धि हममें धर दो,
माँ सरस्वती वर दो, वर दो,
अपना ही विद्रोही बान हममें भी भर दो।

रूत बसंती हो कि मौसमे बहार,
अग जग में रहे तेरी जयकार,
नेह की छाया ज्ञान के सर दो,
अपना ही विद्रॊही आन हममें भी भर दो।

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