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अपनी श्रीमती नीलम के लिए, शादी की चौबीसवीं सालगिरह पर

तुम्हारे साथ बसते बसाते,
चौबीस साल कैसे बीत गये,
हमें पता ही न चला।
तुम्हारे साथ लड़ते लड़ाते,
चौबीस साल बीत कैसे गये,
हमें पता भी न चला।
चाँद सितारे कहीं ज्यादा सुंदर हैं,
धरती अंबर कहीं ज्यादा सुघड़ हैं,
इन पे तुझ संग रिझते रिझाते,
चौबीस साल कैसे जीत गये
हमें पता ही न चला।
फूलॊं के रंग में ज्यादा चमक है,
पंछी के गीत में ज्यादा झनक है,
इन्हें तुझ संग देखते दिखाते,
चौबीस साल कैसे मीत भये,
हमें पता ही न चला।
ये नहीं कि हमें कष्ट नहीं था,
पर हमें रोने का वक्त नहीं था,
उन्हें तेरे संग सहते सहाते,
चौबीस साल कैसे हित भये,
हमें पता ही न चला।
हवा में अब वैसा ज़हर नहीं,
पानी में अब वैसा कहर नहीं,
इन संग तेरे साथ बहते बहाते,
चौबीस साल कैसे ऋत भये,
हमें पता भी न चला।
भूख अब वैसे मारती नहीं,
प्यास अब वैसे काटती नही,
इनसे तेरे संग जूहते जुझाते,
चौबीस साल कैसे हृत भये,
हमें पता भी न चला।
दिल ओ दिमाग अब खाली नहीं,
ज्ञान विज्ञान पहले सा ज़ाली नही,
इन संग तेरे साथ चलते चलाते,
चौबीस साल कैसे बीत गये,
हमें पता भी न चला।
घर कभी बाहर की समस्या रही,
पुणमासी कभी अमावस्या रही,
इनसे तेरे साथ निबटते निबटाते,
चौबीस साल कैसे बीत गये,
हमें पता भी न चला।
हीर, कबीर ओ सुरैया के गाने,
नेह ओ न्याय के अमर अफ़साने,
ऐ नीलू! तेरे संग गुनते गुनाते,
चौबीस साल कैसे बीत गये,
हमें पता ही न चला।
ये नहीं कि पूरे हुए सब सपने,
सब बन गये एक दूजे के अपने,
इन्हें तेरे साथ गढ़ते गढ़ाते,
हमारा जीवन भी बीत जाये!
और हमें पता न चले!

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