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सरस्वती की पुकार

मेरी पुजा को नहीं फूल, मिठाई की दरकार
पूजो तो पूजो मुझे पढ़ लिख के अबकी बार।

पढ़ो तो ऐसे पढ़ो कि धरती की हरियाली बढ़े,
अंबर अपने नीलेपन के सपने नित नये गढ़े,
हर लड़का एक फूल बने, हर ल़ड़की अंगार।
मेरी पूजा को नहीं फूल, मिठाई की दरकार
पूजो तो पूजो मुझे पढ़ लिख के अबकी बार।

लिखो तो इस बार लिखो ऐसा नया विधान,
कि सुख चैन से जी सके जगती का हर इंसान
कि हर मर्द बसंत बने, हर औरत बने बहार।
मेरी पुजा को नहीं फूल, मिठाई की दरकार
पूजो तो पूजो मुझे पढ़ लिख के अबकी बार।

पढ़ लिख कर बनाओ अब ऐसा एक संसार,
माथे हो नेह मुकुट सबके सीने न्याय गलहार,
कि हर जगह विज्ञान खिले, ज्ञान करे गुंजार।
मेरी पुजा को नहीं फूल, मिठाई की दरकार
पूजो तो पूजो मुझे पढ़ लिख के अबकी बार।

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