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पैर के नीचे ज़मीन और सिर के ऊपर आसमान

पैर के नीचे ज़मीन और सिर के ऊपर आसमान,

इस देश में तेरे के सिवा किसके पास है, महान !

मज़दूरॊं के पास न तॊ धन रहे, न विद्या,

हो तो अब्रह्मण्य हॊ या ब्रह्म की अवज्ञा;

ये तॊ तेरा ही रहा है सदा शाश्वत फ़रमान,

इस देश में पैर तले धरती, सिर ऊपर आसमान,

आपके सिवा किसके पास हो सकता है, श्रीमान।

सारे जग को स्वच्छ, स्वस्थ रखने वालॊं को,

अछूत कहा, शुद्र कहा मेहनत करने वालॊं को,

तेरे पिघले सीसे का शिकार हमारा ज्ञान कातर कान

फ़िर किसी पाँव तले भूमि, सिर पर आसमान,

आपके अलावा किसके पास हो सकता है अपान।

ज्ञान पिपासा ने हमें बनाया शंबूक कभी एकलव्य,

इस मामले में तेरा इतिहास रहा सदा दिव्य-भव्य;

हमारे दमन में तुमने ईश्वर तक से लिया श्रमदान

तो किसी और के पैर-पास ज़मीन, सिर पास आसमान,

इस देश में तेरे बग़ैर भला कैसे हो सकता है भगवान,

सारे श्रुति स्मृति तेरे, नियम धरम सब तुम्हारा,

खुद को भूदेव कहा, विष्णु तक को लात मारा,

तेरी स्वार्थ पूर्ति किए सदा जग के नाथ ओ प्राण;

फ़िर किसी के पैर के नीचे ज़मीन, सिर पे आसमान,

तेरे बिना कैसे हों इस भरत खंड में, हे कल्याण।

सारा सत्त तुम्हारा, सब पूर्ण ब्रह्म तेरे बाप का,

रेणुका, अहिल्या तक ने भोगा फल तेरे श्राप का;

ऐसे में पैर ढिग ज़मीन, सिर ढिग आसमान,

औरत ओ शुद्र के पास कैसे हॊं, कहें स्वयंप्रमाण।

इस देश में जैसे हम हैं बे-ज़मीन, बे- आसमाँ

अपने पाप से देश-बाहर तुम हो बेइज़्ज़त, बेज़ुबाँ,

हम तेरे दास सही, तुम उनकी नज़र में हैवान,

अच्छा है अपने पैर तले ज़मीन नहीं सिर पे आसमान।

हम अब बन जायेंगे अमर बेल के अमर फल,

ज्ञान विज्ञान में करेंगे सब का दर्शन ओ दखल,

हम गढ़ॆंगे अब नई ज़मीन, चढ़ॆंगे नये आसमान,

तुम रखो अपनी बंजर ज़मीन ओ अंधेरा आसमान।

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