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कौन सा ऐसा ज़ुल्म है जिसे धर्म ने हम पे ढाया नहीं

कौन सा ऐसा ज़ुल्म है जिसे धर्म ने हम पे ढाया नहीं।
कौन सा ऐसा है सितम खुदा ने हम पे बरपाया नहीं।।

पंडित, पादरी मुल्ले सब इसके सर्वत्र फैले जासूस हैं,
हम इंसानॊं की खुशी से ये सदा से ही नाखुश है,
कहाँ पे ऐसा दर्द है जॊ इन्हॊंने हम पे बरसाया नही।
कौन सा ऐसा ज़ुल्म है जिसे धर्म ने हम पे ढाया नहीं।
कौन सा ऐसा है सितम खुदा ने हम पे बरपाया नहीं।।

मंदिर, मस्ज़िद, गिरज़े इनके आतंक हवस के अड्डॆ हैं,
इनकी ऊँची दीवारॊं में चिने मासूमॊं के खून के धब्बे है,
किसका ऐसा पाप है जिसे इन्होंने हमसे पुजवाया नहीं।

वेद पुराण,बाईबिल कुरान सब इनके शैतानी फ़रमान है,
इनके चलते ही लहुलुहान अपनी धरती ओ आसमान है,
किस कुफ़्र ओ ज़हालत कॊ इन्हॊंने जग में फैलाया नहीं।
कौन सा ऐसा ज़ुल्म है जिसे धर्म ने हम पे ढाया नहीं।
कौन सा ऐसा है सितम खुदा ने हम पे बरपाया नहीं।।

अवतार कभी पयंबर इनके कारण ज़मीं पे आता रहा,
हमारे सुख चैन संग हमारे तन मन को भी खाता रहा,
कहाँ है ऐसा ज़ुर्म जो इन्हॊंने हम पे आजमाया नहीं।
कौन सा ऐसा ज़ुल्म है जिसे धर्म ने हम पे ढाया नहीं।
कौन सा ऐसा है सितम खुदा ने हम पे बरपाया नहीं।।

आऒ अब हम आगे बढे, ज्ञान विज्ञान कॊ अपनाये,
अपने खून से लाल इस ज़मीं कॊ हरी भरी बनाये,
आग से फूल खिलाने का फ़न इनने ने हमे सिखाया नहीं!
कौन सा ऐसा ज़ुल्म है जिसे धर्म ने हम पे ढाया नहीं।
कौन सा ऐसा है सितम खुदा ने हम पे बरपाया नहीं।।

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