मुख्य पन्ना / कविताएँ / अरे इस धरती का कॊई ईश्वर अल्लाह या परमपिता है कि नहीं।

अरे इस धरती का कॊई ईश्वर अल्लाह या परमपिता है कि नहीं।

इधर देखॊ तो लूट पाट, उधर देखॊ तॊ मार काट,
अरे इस पृथ्वी का कॊई ईश्वर अल्लाह या परमपिता है कि नहीं।

जल रहे हैं इंसानी सभ्यता के जनम स्थान,
मज़हब की मार से मानवता है लहूलुहान,
धर्म बना आतंक दिन भी है आंतहीन रात
अरे इस धरती का कॊई ईश्वर अल्लाह या परमपिता है कि नहीं।

इस्लाम मानी शांति इंसानॊं का माँस खा रहा,
ईसाईयत नही प्रेम, माणवता का खून पा रहा,,
इनके युद्ध ने दिया ज़मीं कॊ लाशॊं से पाट,
अरे इस मरती का कॊई ईश्वर अल्लाह या परमपिता है कि नहीं।

हिंदू कहता गुरू सारे देवॊं देवियॊं से आला है,
आज इसके हाथ हाथ गुरू के लिए ही भाला है,
सब तरफ़ से कर रहे गुरुदेवॊं पे घात पर घात,
अरे इस जगती का कॊई ईश्वर अल्लाह या परमात्मा है कि नहीं।

अगर है तॊ बेकार है, नहीं है तॊ नहीं ही है,
ऐसे में हम क्या करें, सोचने की बात यही है,
या हम खुद अपने देव बनें, लायें नया प्रभात!
न कहें सृष्टि का कॊई ईश्वर अल्लाह या परमपिता है कि नहीं।

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