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मारे मारे फिरते हैं बेकस बेकल इंसान

मारे मारे फिरते हैं बेकस बेकल इंसान,
कैसे तेरे अल्लाह,खुदाया,परमपिता भगवान।

इस कदर भूखे प्यासे जन औ माघ पुस की रात,
हैवानॊं से भी गई बीती है मानुष की जात,

देख कर इनकी हालत दुखी औ पस्त है शैतान।

मारे मारे फिरते हैं बेकस बेकल इंसान,
कैसे तेरे अल्लाह,खुदाया,परमपिता भगवान।

इस कदर भूखे प्यासे जन औ माघ पुस की रात,
हैवानॊं से भी गई बीती है मानुष की जात,

देख कर इनकी हालत दुखी औ पस्त है शैतान।
मारे मारे फिरते हैं बेकस बेकल इंसान,

कैसे तेरे अल्लाह,खुदाया,परमपिता भगवान।

बेघर बेदर लोग ऊपर से माघ पूस की रैन,
इतने दुखी न पशु पंछी, न ही जड़ चेतन बेचैन,

इनकी बदहाली पे हैं जीव जंतू भी हैरान।

मारे मारे फिरते हैं बेकस बेकल इंसान,
कैसे तेरे अल्लाह,खुदाया,परमपिता भगवान।

इतने अनपढ़ ज़ाहिल फ़िर माघ पूस के चाँद तारे,
धुँए, धूंध कभी आग से जलते प्राणी प्यारे,

इनके हाल से कातर सब चर अचर जगत हलकान।

मारे मारे फिरते हैं बेकस बेकल इंसान,
कैसे तेरे अल्लाह,खुदाया,परमपिता भगवान।

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