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इस देश का कॊइ मंतरी या प्रधान है कि नहीं

कॊई कानून से ऊपर तॊ कॊई कानून से बाहर है,
अरे, इस देश का कॊइ मंतरी या प्रधान है कि नहीं।

कहीं हत अखलाक तॊ कहीं बलात्कृत ज्यॊति है,
माँ भारती सिसक सिसक कर दिन रात रोती है,
आज कवि सवाल पूछता सिर झुकाये सादर है,
अरे, इस देश का कॊई पति या प्रधान है कि नहीं।

कहीं कलबुर्गी मरे हैं तॊ कहीं पनसारे पड़ॆ है,
इनके हत्यारे सीना ताने हर चौराहे पर खड़ॆ है,
सो शायर ये सवाल पूछता विनय में आकर है,
इस देश का कॊई पति या प्रधान है कि नहीं।

दाभोलकर की हत्या कहीं रोहित की आत्महत्या है,
और इनके संघाती कर रहे सत्य तॊ अब मिथ्या है,
इसलिए गीतकार पूछ रहा ये सब रो-गा कर है,
इस देश का कॊई पति या प्रधान है कि नहीं।

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