विद्रोह

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उस हर औलाद कॊ हम नीम औकात समझते हैं,

जॊ जवानी में अपने बाप कॊ बाप समझते हैं।

 

घर बाहर, दिन रात जॊ विद्रोह पे हो आमादा,

उसी को हम नौजवानी की आब समझते है।

 

पिता से शुरू हॊ के जॊ द्रोह परमपिता तक जाये,

उसी को हम माहताब-आफ़ताब समझते है।

 

नौजवानॊं पर ही टिकी है हमारी सब उम्मीदें,

उनकी बेअदबी कॊ ही हम आदाब समझते है।

 

आदम से ही शुरू हुई रवायत ए आदमियत,

नाफ़रमानी कॊ हम आदमी की जात समझते है।

 

 

 

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