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अगहन पूष की रात

अगहन पूष की रात और इधर

सड़क पर सोते इंसान।
उधर मंदिर मस्ज़िद में मस्ती

काटॆं अल्ला ओ भगवान।

अगहन पूष की रात औ जन

धन से दीन दुखी है लोग,
उधर मम्दिर मस्ज़िद में गिर

रहे चांदी सोने के जोग,
ऐसी भक्ति, ऐसी शक्ति देख कर

कविराज भी हैं हैरान।
अगहन पूष की रात और इधर

सड़क पर सोते इंसान।
उधर मंदिर मस्ज़िद में मस्ती

काटॆं अल्ला ओ भगवान।
अगहन पूष की रात, भूख से

मरें आकुल व्याकुल बच्चे,
उधर मुल्ले पांडॆ को षटरस

व्यंजन, छप्पन भोग सच्चे,
ऐसी ही भुक्ति, ऐसी ही मुक्ति

देते बाईबिल, वेद, कुरान।
अगहन पूष की रात और इधर

सड़क पर सोते इंसान।
उधर मंदिर मस्ज़िद में मस्ती

काटॆं अल्ला ओ भगवान।
अगहन पूष की रात में कुड़ा

कर्कट जलाते ज़ाहिल जन,
उधर अपने घरॊं ऐश करे

सर्वज्ञानी खुदा ऒ आनंद घन,
ऐसी ही बुद्धि, ऐसी ही शुद्धि देते

है परम नवीन विद्वान।
अगहन पूष की रात और इधर

सड़क पर सोते इंसान।
उधर मंदिर मस्ज़िद में मस्ती

काटॆं अल्ला ओ भगवान।

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