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माघ पूस की रात खुले में सोते बेघर, बेदर, बेकल बच्चे

माघ पूस की रात खुले में सोते बेघर, बेदर, बेकल बच्चे। कैसे कहें इनके ईश्वर अल्लाह सबसे अच्छे, सबसे सच्चे।

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मारे मारे फिरते हैं बेकस बेकल इंसान

मारे मारे फिरते हैं बेकस बेकल इंसान, कैसे तेरे अल्लाह,खुदाया,परमपिता भगवान। इस कदर भूखे प्यासे जन औ माघ पुस की रात, हैवानॊं से भी गई बीती है मानुष की जात, देख कर इनकी हालत दुखी औ पस्त है शैतान।

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अपना देश बड़ा प्यारा देश

अपना देश बड़ा प्यारा देश, जिसकी लाठी उसी की भैंस। वैज्ञानिक बन गये हैं सब पाखंडी, विद्वान हो गया है हर हर शिखंडी, अब कौन किसकॊ रोके नरेश। अपना देश बड़ा प्यारा देश, जिसकी लाठी उसी की भैंस। साहित्यकार बन गये सब कायर, बुज़दिल हो गये हैं सारे शायर, कौन कहे कि राजा नग्न वेश। अपना देश बड़ा प्यारा देश, जिसकी लाठी उसी की भैंस। राजा का चल रहा है राज, जनता का गल रहा है ताज, फल रहा अनाचार निर्निमेष। अपना देश बड़ा प्यारा देश, जिसकी लाठी उसी की भैंस। भूखे को अन्न न प्यासे को पानी मूर्ख को ज्ञान न राजा को रानी, भारत माँ के दिल कॊ भारी ठेस। अपना देश बड़ा प्यारा देश, जिसकी लाठी उसी की भैंस। न्याय की आँखें अब चार चार, ऊँच नीच देखे है दीदे कॊ फाड़, न्याय देवी के रहे न वस्त्र शेष। अपना देश बड़ा प्यारा देश, जिसकी लाठी उसी की भैंस। न्याय-अन्याय की हो गई शादी, धन, धर्म, सत्ता की बढ़ी आबादी, जन की चिंता कौन करे जनेश। अपना देश बड़ा प्यारा देश, जिसकी लाठी उसी की भैंस। आऒ अब कुछ ऐसा यूँ करें, जिसकी भैंस हो वही लाठी धरे, तभी मिटेगा जन का क्लेश अपना देश बड़ा प्यारा …

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अरे इस धरती का कॊई ईश्वर अल्लाह या परमपिता है कि नहीं।

इधर देखॊ तो लूट पाट, उधर देखॊ तॊ मार काट, अरे इस पृथ्वी का कॊई ईश्वर अल्लाह या परमपिता है कि नहीं। जल रहे हैं इंसानी सभ्यता के जनम स्थान, मज़हब की मार से मानवता है लहूलुहान, धर्म बना आतंक दिन भी है आंतहीन रात अरे इस धरती का कॊई ईश्वर अल्लाह या परमपिता है कि नहीं। इस्लाम मानी शांति इंसानॊं का माँस खा रहा, ईसाईयत नही प्रेम, माणवता का खून पा रहा,, इनके युद्ध ने दिया ज़मीं कॊ लाशॊं से पाट, अरे इस मरती का कॊई ईश्वर अल्लाह या परमपिता है कि नहीं। हिंदू कहता गुरू सारे देवॊं देवियॊं से आला है, आज इसके हाथ हाथ गुरू के लिए ही भाला है, सब तरफ़ से कर रहे गुरुदेवॊं पे घात पर घात, अरे इस जगती का कॊई ईश्वर अल्लाह या परमात्मा है कि नहीं। अगर है तॊ बेकार है, नहीं है तॊ नहीं ही है, ऐसे में हम क्या करें, सोचने की बात यही है, या हम खुद अपने देव बनें, लायें नया प्रभात! न कहें सृष्टि का कॊई ईश्वर अल्लाह या परमपिता है कि नहीं।

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बताते है कि परमपिता का कण कण में विधान है,

सुनते हैं कि परमेश्वर, परमात्मा सर्वशक्तिमान है, तॊ बूढ़े विद्वानॊं कॊ मरवाने वाला कौन महान है। कहते हैं कि खुदा अल्लाह एक सबसे बड़ा रहमान है, तॊ नवयुवक काफ़िरॊं का कत्ल करवाने कौन महान है, बताते है कि परमपिता का कण कण में विधान है, फ़िर पुराने महल, मूर्तिय तुड़वाने वाला कौन महान है। समझाते हैं कि सब धर्मॊं का बस एक ही भगवान है, फ़िर इन्हें आपस में लड़वाने वाला कौन महान है। सिखाते मंदिर मस्ज़िद गिरजे सब एक के ही सामान है, फ़िर इनकॊ जलवाने, ढहवाने वाला बोलो कौन म्हान है। पढ़ाते हिंदू, मुस्लिम, ईसाई सब एक की ही संतान हैं, फ़िर इन्हें एक दूजे से कटवाने वाला वॊ कौन महान है। इसलिए ये सव मानॊ कि ये सब के सब शैतान हैं, परमेश्वर अल्लाह खुदा भगवान कॊई नहीं महान है। धरती सबकी माता है ओ सबके पिता आसमान हैं, जॊ भी इस सच कॊ जान ले समझॊ वही महान है।

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नास्तिकॊं कॊ जॊ मरवाये, उस अल्लाह कॊ हम क्या कहें

नास्तिकॊं कॊ जॊ मरवाये, उस अल्लाह कॊ हम क्या कहें,काफ़िरॊं की हत्या करवाये उस भगवान कॊ हम क्या कहें। औरतॊं संग बलात्कार कॊ भी बिल्कुल सही ठहराते धरम,बच्चॊं संग हर अनाचार कॊ एकदम ठीक कहते हरम,शैतानॊं के गुलाम बने इस नये इंसान को हम क्या कहें,नास्तिकॊं कॊ जॊ मरवाये, उस लल्लाह कॊ हम क्या कहें,काफ़िरॊं की हत्या करवाये उस भगवान कॊ हम क्या कहें। अपने संग अपने सधार्मिकॊं कॊ मारना जॊ सिखलाये,दूसरे धर्मॊं के पुराने थानॊं कॊ तॊड़ने की राह दिखाये,वैसे कुरआन, वैसी बाईबिल, वैसे पुराण को क्या कहें,नास्तिकॊं कॊ जॊ मरवाये, उस लल्लाह कॊ हम क्या कहें,काफ़िरॊं की हत्या करवाये उस भगवान कॊ हम क्या कहें। जिस पथ में बुज़ुर्ग विद्वानॊं की हत्या भी रायज हॊ,जिस दीन में नौजवान लेखक का कत्ल तक जायज हो,उसके मठ, उसके मस्ज़िद, उसके बथान को हम क्या कहें,नास्तिकॊं कॊ जॊ मरवाये, उस लल्लाह कॊ हम क्या कहें,काफ़िरॊं की हत्या करवाये उस भगवान कॊ हम क्या कहें। जिसमें इतिहास कॊ जानना और मानना भी एक पाप हो,जिसमें भविष्य कि फ़िकर करना भी एक अपराध हो,ऐसे धार्मिक अकीदे, ऐसे दीनी ज्ञान कॊ हम क्या कहें,नास्तिकॊं कॊ जॊ मरवाये, उस लल्लाह कॊ हम क्या कहें,काफ़िरॊं की हत्या करवाये उस भगवान कॊ हम क्या कहें।

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कैसे करूँ ऐ सरस्वती मैं अर्चन तेरा

कैसे करूँ ऐ सरस्वती मैं अर्चन तेरा मेरे हर तरफ़ घिर रहा अज्ञान अंधेरा। जिन पर है तेरी कृपा वे सब बेईमान है धन धर्म से अंधे, विद्या से अनजान हैं, जन के मन कॊ इनने विद्या दूर फ़ेरा, कैसे करूँ ऐ सरस्वती मैं अर्चन तेरा मेरे हर तरफ़ घिर रहा अज्ञान अंधेरा। पावनता के नाम तुझे सबसे दूर रखते, अपने घर में कैद दूनिया का नूर रखते, ऐसे में मैं क्या करूँ, क्या करे मन मेरा, कैसे करूँ ऐ सरस्वती मैं अर्चन तेरा मेरे हर तरफ़ घिर रहा अज्ञान अंधेरा। अब पूजन बंद कर ज्ञान का प्रचार करूँगा, विज्ञान कॊ फैलाऊँगा, विद्या प्रसार करूँगा, तू सरस्वती से अरूंधति बनेगी,हॊगा सवेरा, कैसे करूँ ऐ सरस्वती मैं अर्चन तेरा मेरे हर तरफ़ घिर रहा अज्ञान अंधेरा।

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धन, धर्म और सत्ता के गठजॊड़ कॊ हम तॊड़ दें

धन, धर्म और सत्ता के गठजॊड़ कॊ हम तॊड़ दें, जॊ इंसां इनसे जुड़ा हॊ, उस इंसां को छॊड़ दें। जितने ज्यादा धर्म ढॊंग हॊंगे उतने ही पापी हॊंगे, जितने हॊंगे कर्म कांड उतने ही अपराधी हॊंगे, आऒ अब जगती कॊ नेह न्याय से जॊड़ दें। धन, धर्म और सत्ता के गठजॊड़ कॊ हम तॊड़ दें, जॊ इंसां इनसे जुड़ा हॊ, उस इंसां को छॊड़ दें। कॊई पैग़ंबर, औतार, कॊई खलीफ़ा बना हुआ है, पर सब का दामन खून पीब से सना हुआ है, आऒ इनसे दूर हम सृष्टि कॊ नया मॊड़ दें। धन, धर्म और सत्ता के गठजॊड़ कॊ हम तॊड़ दें, जॊ इंसां इनसे जुड़ा हॊ, उस इंसां को छॊड़ दें। मंदिर, मस्ज़िद गिरज़े इंसानी खुशियॊं के मकबरे हैं, इंसां किसतरह खुश होगा जबतक ये साबुत खड़ॆ है, आऒ इनके धन से हम जन-गन कॊ लाख करॊड़ दें। धन, धर्म और सत्ता के गठजॊड़ कॊ हम तॊड़ दें, जॊ इंसां इनसे जुड़ा हॊ, उस इंसां को छॊड़ दें।

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जब सब कुछ कर दिया है तूने, धन धर्म के नाम पे

जब सब कुछ कर दिया है तूने, धन धर्म के नाम पे, धोखा देते क्यूँ इंसां कॊ भाग्य, कर्म के नाम पे। रजत चम्मच ओ स्वर्ण कलम संग जिसका हुआ जनम, उसका होगा ही सुंदर, ताकतवर तन ऒ सुशील मन, जब कर दी हर चीज़ तूने जाति -ज़ुर्म के नाम पे, धोखा देते क्यूँ इंसां कॊ भाग्य, कर्म के नाम पे। सदियॊं संचित संस्कार जिसमें बल, विद्या-बुद्धि, रहेगा ही आगे उससे जिसका जन्म ही अशुद्धि, जब कर दी हर बात तूने संस्कृति मर्म के नाम पे, धोखा देते क्यूँ इंसां कॊ भाग्य, कर्म के नाम पे। भाग्य मानें जब सबके जन्मना भाग बराबर हॊं कर्म तब मानें जब सबके दिल की आग बराबर हॊ जब कर दी हर शै तूने निठल्ले बेशर्म के नाम पे, धोखा देते क्यूँ इंसां कॊ भाग्य, कर्म के नाम पे।

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ईश्वर अल्लाह तेरे जहाँ में इतनी भूख बीमारी क्यूँ है

ईश्वर अल्लाह तेरे जहाँ में इतनी भूख बीमारी क्यूँ है, इतनी हरी भरी धरती पर तेरा वरदान यूँ भारी क्यूँ है। क्या जाड़ा गरमी क्या बरसात सर पे छत कॊ तरसे जनता सारी, तेरे मंदिर मस्ज़िद सब संगमरमरी महल अटारी क्यूँ हैं। जन गण तो ऐसे अधनंगे – बुच्चे, फटॆहाल और मलीन, अनाड़ी, तेरे मंदिर मस्ज़िद में मखमल, रेशम की भरमारी क्यूँ है। भूख से आकूल लोग सभी और प्यास से व्याकुल नर नारी, तेरे साधक सदा षटरस व्यंजन,छप्पन भॊग आहारी क्यूँ हैं अज्ञान से जाहिल हर इंसान, लाचार भुगतने को बेकारी, तेरे कर्ता धर्ता अंधविश्वास के बने व्यापारी क्यूँ हैं, दुख रॊग ही इंसान का जीवन है ओ सारे सुख हैं दुराचारी, पर तेरे मंदिर मस्ज़िद में मस्त मलंग हर पुजारी क्यूँ है।

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