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ये क्यॊं हो रहा है हमारे दौर में

इधर दो घटनायें ऐसी हो गईं हैं जिनसे मन बहुत दुखी हॊ गया है। उधर बिहार में कुछ काँवड़ियॊं ने अपनी धार्मिक अंध श्रद्धा के आवेश और आवेग में एक्सप्रेस ट्रेन को रोकने की कॊशिश की और उसमें मारे गये। उनकी ज़हालत इस कदर असीम थी कि वे ये भी न सोच पाये कि एक्सप्रेस ट्रेन कॊ इस तरह से रॊक पाना किसी के लिए संभव नहीं है। भांग का सेवन करने वाले भगवान शिव के भक्त भी धर्म रूपी भांग की पिनक में रहे हॊंगे यकीनन। उधर महाराष्ट्र की विद्वत नगरी पुणॆ में अंधश्रद्धा का उन्मूलन करने में लगे दाभॊलकर साहब की हत्या कर दी गई है। ऐसे में क्या अब भी कॊई शक बच जाता है कि धर्म अफ़ीम नहीं है अगर तॊ न हॊ, मगर किसी न किसी तरह का नशा ज़रूर है। ये बात यहाँ ग़ौर तलब है कि जिस तरह से बनारस उत्तर भारत में विद्वता का गढ़ रहा है उसी तरह विंध्य के उस पार पुणे नगरी विद्वानॊं की नगरी रही है और शास्त्रार्थ की काफ़ी सजीव परंपरा थी यहाँ कभी। वैसे भी ये नगरी भंडारकर ओरिएंटल रिसर्च इंस्टिट्युट की नगरी है। इस संस्थान ने रामायण और महाभारत का सबसे प्रामाणिक संस्करण तैयार किया …

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पहचान का धर्म बनाम धर्म की पहचान

आज हर धर्म में तरह तरह के पहचान के लिए मारा मारी हो रही है। हर आदमी अपने आचरण के बदले अपने आवरण से ये बताने की कॊशिशॊं में लगा है कि वॊ कौन है, किस धर्म से है। इस सारे व्यापार में हुआ ये है कि सच्ची धार्मिकता का सत्यानाश या कहें कि सर्वनाश हो गया है तथा नकली धार्मिकता पूरे उभार पर है। इसी के कारण ये भी हो रहा है कि हर धर्म आज अपनी आबादी और अपने साम्राज्य को भी बढ़ाने में लगा हुआ है। धर्म कॊ कुछ लोग सबसे बड़ा साम्राज्यवाद यूँ ही नहीं कहते हैं। हर धर्म का भगवान आज रानी विक्टॊरिया का क्लोन बना हुआ है जॊ ये कहने पे आमादा है कि हमारे राज्य में सूरज तक नहीं डूबता। जब ये बात अंग्रेज़ अपनी रानी के साम्राज्य के बारे में कहते थे तॊ उस समय ज़वाब में वी के कृष्ण मेनन ने इनसे ये कहने की हिम्मत थी : sun does not set in your empire as God cannot trust you in dark. ये तो अच्छा है कि आज की तारीख में भी किसी भी धर्म के ईश्वर का साम्राज्य इतना बड़ा नहीं है वरना मुझे ये कहना पड़ता : In your …

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सनातन (हिंदू) धर्म से उसकी सुंदरता न छीनें

आज कल जिसे देखॊ वही सनातन धर्म का अलम्बरदार बन के सामने  रहा है। बाबा रामदेव से लेकर अबिजीत मिश्र जैसे लोग घमासान मचाये हुए हैं। कॊई मोहन भागवत बना फ़िर रहा है तॊ कॊई गिरिराज सिंह बना हुआ है। मजे कि बात ये है कि इनमें से किसी कॊ सनातन धर्म की सुंदर परंपराऒं का ज्ञान भी नहीं है। आईए मैं आज आप कॊ दॊ कथायें सुनाता हूँ जिसका जिक्र श्रीमद्भागवत में है। पहले हम आपकॊ नारद मॊह कि कथा सुनाते हैं। नारद मॊह एक बार हुआ यूँ कि नारद कॊ अपने विरागी और वितरागी होने पर बड़ा घमंड हॊ गया। वे भगवान विष्णु के परम भक्त थे। सो विष्णु ने हँसी हँसी में उनके गर्व कॊ चूर करना चाहा। सॊ उन्हॊंने एक माया नगरी बनाई। उसके राजा की बेटी बड़ी सुंदर थी। नारद ने उसे देखा तॊ मोहित हो गये। उन्हें पता चला कि उस लड़की का स्वयंवर होने वाला है। नारद तुरंत भगवान विष्णु के पास गये। कहा कि मुझे उस लड़की से प्रेम हो गया है। दुनिया में सबसे सुंदर आप है। हे हरि आप मुझे अपना रूप ही दे दीजिए। भगवान विष्णु ने ही माय नगरी बनाई थी। उन्ह्वें कुछ और ठिठॊली सूझी। हरि का …

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शहीद ए आज़म भगत सिंह

28 सितंबर, 1907 कॊ जन्म और 23 मार्च 1931 कॊ फ़ाँसी। आखिर क्या था 23 साल के इस नौजवान में जिसकी याद आते ही दिल ओ दिमाग़ में मानवजाति की आज़ादी का सपना जगने लगता है! जिसकी याद आते ही मन के आकाश में एक छॊटा सा भगत सिंह ध्रुवतारे की तरह जगमगाने लगता है! याद करने पर एक छॊटा सा बालक याद आता है जॊ अपने पिता के साथ एक दिन खेत में गया था। इधर पिता अपनी लहलहाती फ़सल को देख के मगन थे और उधर बालक ज़मीन खोदने में लगा था। पिता ने देखा तॊ पूछा,’ ये क्या कर रहे हॊ? बच्चे ने कहा’ ज़मीन खॊद रहा हूँ और इस में बंदूक रोप कर बंदूक की फ़सल उगाऊँगा और फ़िरंगी कॊ भगाऊँगा।’ ऐसा हॊता क्यॊं नही। ये बालक सरदार अजित सिंह और सरदार स्वर्ण सिंह का भतीजा था। इसके दोनॊ चाचा आज़ादी के दीवाने थे। पिता किशन सिंह भी सुराजी थे। ऐसे में बच्चे का इंकलाबी होना तॊ तय ही था। ऐसा ही एक दूसरा किस्सा है। जब इनके चाचा जेल में ही बीमार हो गये और अंग्रेज सरकार ने तब भी उन्हें रिहा नहीं किया तॊ इनकी चाची रॊने लगीं थी। इस पर सात साल के …

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ईश्वर अल्लाह तेरे जहां में इतनी नफ़रत जंग है क्यॊ?

ईश्वर अल्लाह तेरे जहां में इतनी नफ़रत जंग है क्यॊ? इंसान का दिल इतना बड़ा है, तेरा दिल यूँ तंग है क्यूँ। इस ध्रती पर हम सब रहते, मिल जुल कर सुख दुख सहते, तू तॊ ज़न्नत स्वर्ग का वासी, तू भला ऐसे अपंग है क्यूँ हर रंग के हम सारे लोग’ एक दूसरे से करें सहयॊग, तुम दोनॊं के बीच का रिश्ता, पर इस कदर बदरंग है क्यूँ हम एक दूजे के आते काम, ये और बात है हम लेते दाम, पर तेरे सब संतॊं दूतॊं के बीच मची हुई ये जंग है क्यूँ। हम जब भी लड़ते दो चार ही मरते, औतार पयंबर के लड़ते,लाख हज़ार मरते, तुम अदोनॊं के दिल में बॊलॊ, खून खराबा संग है क्यूँ?

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कौन सा ऐसा ज़ुल्म है जिसे धर्म ने हम पे ढाया नहीं

कौन सा ऐसा ज़ुल्म है जिसे धर्म ने हम पे ढाया नहीं। कौन सा ऐसा है सितम खुदा ने हम पे बरपाया नहीं।। पंडित, पादरी मुल्ले सब इसके सर्वत्र फैले जासूस हैं, हम इंसानॊं की खुशी से ये सदा से ही नाखुश है, कहाँ पे ऐसा दर्द है जॊ इन्हॊंने हम पे बरसाया नही। कौन सा ऐसा ज़ुल्म है जिसे धर्म ने हम पे ढाया नहीं। कौन सा ऐसा है सितम खुदा ने हम पे बरपाया नहीं।। मंदिर, मस्ज़िद, गिरज़े इनके आतंक हवस के अड्डॆ हैं, इनकी ऊँची दीवारॊं में चिने मासूमॊं के खून के धब्बे है, किसका ऐसा पाप है जिसे इन्होंने हमसे पुजवाया नहीं। वेद पुराण,बाईबिल कुरान सब इनके शैतानी फ़रमान है, इनके चलते ही लहुलुहान अपनी धरती ओ आसमान है, किस कुफ़्र ओ ज़हालत कॊ इन्हॊंने जग में फैलाया नहीं। कौन सा ऐसा ज़ुल्म है जिसे धर्म ने हम पे ढाया नहीं। कौन सा ऐसा है सितम खुदा ने हम पे बरपाया नहीं।। अवतार कभी पयंबर इनके कारण ज़मीं पे आता रहा, हमारे सुख चैन संग हमारे तन मन को भी खाता रहा, कहाँ है ऐसा ज़ुर्म जो इन्हॊंने हम पे आजमाया नहीं। कौन सा ऐसा ज़ुल्म है जिसे धर्म ने हम पे ढाया नहीं। कौन सा …

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धर्म या मज़हब के बारे में मार्क्स के ख्याल तथा आज के ज़माने में उनकी ज़रूरत

धर्म की सतत आलोचना करते रहना ही आलॊचना का सतत धर्म है। दुख की बात है कि भारत में आज धर्म की आलोचना नहीं हॊ रही है। आज हर तरह के अंध विश्वास जन जीवन में फैलते जा रहे हैं। मगर कॊई इनके खिलाफ़ कुछ भी नहीं कर रहा है। वास्तव में मार्क्स धर्म की समालोचना कॊ फ़लसफ़े का सबसे ज़रूरी काम मानते थे। वे इसे क्रांति कर्म का पहला कदम मानते थे। हेगेल की किताब ‘ फ़िलॉसफ़ी ऑफ़ राईट ‘ की भूमिका के तौर पर उन्हॊंने जॊ भी लिखा था वॊ धर्म के बारे में उनके सिद्धांतॊं का एक तरह से निचॊड़ है। मैं सबसे पहले मार्क्स के धर्मसंबंधी इस लेख के विचारॊं का अनुवाद रखना चाहता हूँ: ‘जैसे ही हम स्वर्ग और परमात्मा तथा धर्मवेदी के सिद्धांतॊं का खंडन करते हैं वैसे ही इंसान के नापाक वज़ूद की जॊ भयंकर ग़लती ह्या वह नष्ट हॊने कॊ आ जाती है। हमारे ऐसा करते ही वही इंसान जॊ अब तक धार्मिक स्वर्ग की अति काल्पनिक दुनिया में जी रहा था तथा जिसमें वॊ अपने लिए किसी अतिमानव की तलाश कर रहा था; वह अब किसी भी तरह से सिर्फ़ अपने आप के ख्याल या अपनी खुदी के ख्याल से संतुष्ट …

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प्यारा अफ़लातून

ये किताब ग्यारह खंडॊं में है। इसके खंडॊ में अफ़लातून के फ़लसफ़े के विभिन्न पहलुऒं के ऊपर चर्चा की गई है तथा उस विषय से संबंधित सम्वादॊं के अनुवाद भी हैं और उन सम्वादॊं के बारे में दुनिया भर के महानतम दार्शनिकॊं और वैज्ञानिकॊं के विचार भी हैं तथा साथ साथ उसमें कुछ कहानिया और कवितायें भी हैं जॊ फ़लसफ़े के संबंधित पहलुऒं कॊ आसानी से समझने में मदद करती हैं।

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जब से अल्लाह के बंदॊं के बीच छिड़ी है जंग,

जब से अल्लाह के बंदॊं के बीच छिड़ी है जंग, तब से खुदा के नूर का उतरता जा रहा है रंग। कहीं शिया-सुन्नी भिड़ॆ हैं, कहीं अहमदिया मरे हैं, और हर जगह बहाबी सबके विरूद्ध अड़ॆ-लड़ॆ हैं, इनकी मारकाट कॊ देख फ़रिश्ते भी हैं दग। जब से अल्लाह के बंदॊं के बीच छिड़ी है ज़ंग, तब से खुदा के नूर का उतरता जा रहा है रंग। उम्मा राज ला रहा कॊई खिलाफ़त मचा रहा, सुन्नत में लगा है कॊई शरीयत ही लगा रहा, इन सब के कुँए में ही पड़ी है जहरीली भंग जब से अल्लाह के बंदॊं के बीच छिड़ी है ज़ंग, तब से खुदा के नूर का उतरता जा रहा है रंग। सारे जग कॊ मुसलमान बनाने में ये लगे हुए, जो काम अल्लाह ने ना किया उसी में पगे हुए, इनके अनाचार से शैतान कॊ मिला सत्संग, जब से अल्लाह के बंदॊं के बीच छिड़ी है ज़ंग, तब से खुदा के नूर का उतरता जा रहा है रंग। सारी दुनिया के मालिक का राज छॊटा हो रहा, उसकी नज़र में मज़हब का सिक्का खोटा हो रहा, ऐसे मज़हबी लोगॊं बेहतर उसे काफ़िर मलंग, जब से अल्लाह के बंदॊं के बीच छिड़ी है ज़ंग, तब से खुदा के …

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ईश्वर, अल्लाह, भगवानॊं ने नाश दिया संसार

ईश्वर, अल्लाह, भगवानॊं ने नाश दिया संसार, आऒ अब इनका नाश कर हम लायें नई बहार। मंदिर, मस्ज़िद गुरूद्वारॊं में है जमा अपार धन, इधर फ़िरते हम भूखे प्यासे और आधे नंगे तन, आऒ इनमें शुरू करे हम पढ़ाई दवाई कारोबार, ईश्वर, अल्लाह, भगवानॊं ने नाश दिया संसार, आऒ अब इनका नाश कर हम लायें नई बहार। गीता-कुरान-बाईबिल-पुराण उगाते आतंक-ज़हर-फल, इनके पन्नॊ की आग से हम रहे सदा से मर जल, आऒ इनकी जगह हम रोपॆं रूमानी-रूहानी प्यार, ईश्वर, अल्लाह, भगवानॊं ने नाश दिया संसार, आऒ अब इनका नाश कर हम लायें नई बहार। पुजारी-पादरी-मुल्ले-ग्रंथी के हाथॊं सिमटी सारी ताकत, इन्हीं पैदा से होती है मार काट की सारी आफ़त, आऒ इन्हें हटा के बनायें मंसूर-मज़्दक की सरकार, ईश्वर, अल्लाह, भगवानॊं ने नाश दिया संसार, आऒ अब इनका नाश कर हम लायें नई बहार। हिंदू-मुस्लिम-सिख-ईसाई हम बने रहेंगे जब तक, सपने में भी नहीं रहेंगे सुखचैन धरा पे तबतक, आऒ इन से आगे बढ़ें सुकरात-सरमद संग साकार, ईश्वर, अल्लाह, भगवानॊं ने नाश दिया संसार, आऒ अब इनका नाश कर हम लायें नई बहार।

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