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दिल्ली डायरी

Delhi Diary इस स्तम्भ की शुरुआत मैं एक नये तरीके से कर रहा हूँ। इस में मैं सबसे बाद में देखे या सुने कार्यक्रम का जिक्र सबसे पहले करूँगा।     सो इस सिलसिले में मैं शुरूआत सबसे पहले कल ही श्रीराम सेंटर में देखे गये एक नाटक से करना चाहता हूँ। (1) कल जिस नाटक कॊ मैंने देखा उसमें एक ही इंसान के खंड खंड व्यक्तित्व की कहानी है। इस कहानी का नाम द्रौपदी है। इसमें ऊपर से देखें तॊ एक भरा पूरा खुशहाल और एकल परिवार है। इसमें पति पत्नी और दो बच्चे है। समय के साथ जीवन के भीतरी बाहरी दबावॊं के कारण पति का व्यक्तित्व पाँच हिस्से में बंट जाता है। एक हिस्सा एक दवा कंपनी के मुलाज़िम का है। दूसरा हिस्सा एक शराबी का है। तीसरा हिस्सा एक ऐय्याश इंसान का है चौथा हिस्सा उस इंसान का है जॊ जीवन कॊ न्याय नीति के साथ जीना चाहता है। सबसे बुरी हालत इसी हिस्से की होती है। जब नायक अपने दफ़्तर में घॊटाला करता है तॊ उसका एक हाथ सड़ जाता है। ज्ब नायक अपनी कार से एक बच्चे कॊ कुचलने के बाद भाग जाता है तॊ उसकी एक पैर सड़ जाता है। जब उसकी प्रेमिका …

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क्वांतम की सच्चाई, truth as per Quantum mechanics

Reality doesn’t exist until we measure it, quantum experiment confirms Mind = blown. FIONA MACDONALD 1 JUN 2015 230.4k Australian scientists have recreated a famous experiment and confirmed quantum physics’s bizarre predictions about the nature of reality, by proving that reality doesn’t actually exist until we measure it – at least, not on the very small scale. That all sounds a little mind-meltingly complex, but the experiment poses a pretty simple question: if you have an object that can either act like a particle or a wave, at what point does that object ‘decide’? Our general logic would assume that the object is either wave-like or particle-like by its very nature, and our measurements will have nothing to do with the answer. But quantum theory predicts that the result all depends on how the object is measured at the end of its journey. And that’s exactly what a team from the Australian National University has now found. “It proves that measurement is everything. At the quantum level, reality does not exist if you are not looking at it,” lead researcher and physicist Andrew Truscott said in a press release. Known as John Wheeler’s delayed-choice thought experiment, the experiment was first proposed …

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Donot be afraid of death

Do not be afraid of death (seen by me in dream) (On a high way two persons are seen walking. One is humming something and the other is curious about what is he humming. The humming person is Charvak and the curious one is Epicurus)   Epicurus: hey, sir, what are you humming so sweetly, what is its meaning?   Charvak: It is my couplet in Sanskrit. Its meaning is ‘live happily till there is life. For no one is outside the gaze of the Death.   Epicurus: by god, this is what I also say. That one should not fear death and that from every other thing there may be some security, but as far as death is concerned we live in city without walls.   Charvak: So nice. At least, there is some one person who thinks like me. There in my country every one was against this doctrine of mine. They started by burning my books and ended by burning myself. So there is no use in myself telling something about my own philosophy as there are no takers for my philosophy. So, you tell me something about your own philosophy.   Epicurus: Though in my sect …

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इस में हम आपकॊ ज्ञान विज्ञान विश्व विद्यालय द्वारा करवाये जाने वाले कार्यक्रमॊं के बारे में बतलाते रहेंगे। हमारा पहला कार्यक्रम 27 नवम्बर कॊ डा जगदीश चंद्र बसु के जन्म दिन (30 नवंबर) के अवसर पर हॊगा। इस दिन हम इस वेब साईईट में दी गई सामग्री के आधार पर एक ऑन लाईन टेस्ट लेंगे। इस टेस्ट के आधार पर हम बच्चॊं कॊ ईनाम भी देंगे।

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Euthyphro in 21st century

  Euthyphro in 21st century (Socrates and Euthyphro in The king’ s i.e Archon’s court)   Socrates: Hey Euthyphro, how come you are here?   Euthyphro: I am here to prosecute my father for a murder.but what are you doing here?   Socrates:  I am also here in connection with a litigation in which I have to answer the charges leveled against me by Anitus and Melitus and company. They have accused me of leading the youths stray and also worshipping foreign Gods.   Euthyphro :so sad.   Socrates: But how could your father murder some one. He is such a nice man.   Euthyphro: Oh, he did not do it knowingly. But a murder is a murder. And it is in the interest of Piety or justice that he be punished.   Socrates: But, I think puniing one’s own father is not right, nor it is pious.   Euthyphro: No, I think, rules of  piety and righteousness are same for one and all. So, even if a father acts in an injudicious manner, he has to be punished by a sun with the help of the court.   Socrates: But what is Piety? What is righteousness? Do you know …

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या तॊ दुनिया के सारे के सारे इंतज़ाम पाप हैं

या तॊ दुनिया के सारे के सारे इंतज़ाम पाप हैं, या फ़िर ईश्वर अल्लाह के सब पैग़ाम पाप है।   एक ओर गगनचूंबी मंदिरमस्ज़िद गिरजे गुरूद्वारे, दूसरी तरफ़ मारे मारे फ़िरते इंसां बेघर बेसहारे, सो या तॊ ये सारे के सारे धर्म धाम पाप है, या फ़िर ईश्वर अल्लाह के सब पैग़ाम पाप हैं।   गीता-इंज़िल-कुरआन-पुराण सब ज्ञान के भंडार हैं, इधर निर्बल,निर्धन बच्चॊं कॊ हर अक्षर अंगार है, तॊ या तॊ ये सब के सब धर्म के ठाम पाप हैं, या फ़िर ईश्वर अल्लाह के सब पैग़ाम पाप है।   पुजारी-पादरी-मुल्ले-ग्रथी सब ऊपरवाले के कारसाज़ नीचे बेकस बेकल लोग, यहाँ हर जगह शैतान राज, या तॊ इन सब के सारे के सारे धर्म-काम पाप हैं, या फ़िर ईश्वर अल्लाह के सब पैग़ाम पाप है।    

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उठॊ जागॊ नौजवान, फ़िर भगत सिंह बन जाने के दिन आये

उठॊ जागॊ नौजवान, फ़िर भगत सिंह बन जाने के दिन आये, सरफ़रोशी की तमन्ना कॊ दिल में फ़िर जगाने के दिन आये। तब थे अत्याचारी अंग्रेज़ सफ़ेद, नस्लवादी, लूटेरे सामराजी अब हैं हत्याचारी मनुवादी, काले ब्राह्मणवादी पूरे नाज़ी, उठॊ जागॊ नौजवान,इनकी माया-कंठी-बद्धी जलाने के दिन आये। उठॊ जागॊ नौजवान, फ़िर भगत सिंह बन जाने के दिन आये, सरफ़रोशी की तमन्ना कॊ दिल में फ़िर जगाने के दिन आये। वे छीन रहे थे धन जन, ये छीनते रहे हैं हमारा सब ज्ञान, वे छीन रहे थे घर दुकान, ये छीनते रहे हैं मान सम्मान, उठो जागे नौजवान इन से अब सीधे टकराने के दिन आये, उठॊ जागॊ नौजवान, फ़िर भगत सिंह बन जाने के दिन आये, सरफ़रोशी की तमन्ना कॊ दिल में फ़िर जगाने के दिन आये। क्या दलित, क्या मुस्लिम, क्या पिछड़े, क्या सब आदिवासी, क्या महिला, क्या बच्चियाँ; ये दे रहे सबके दिल को फाँसी, उठॊ जागॊ नौजवान, फ़िर खुद कॊ वीर बनाने के दिन आये उठॊ जागॊ नौजवान, फ़िर भगत सिंह बन जाने के दिन आये, सरफ़रोशी की तमन्ना कॊ दिल में फ़िर जगाने के दिन आये।

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