लेख – ज्ञान विज्ञान विश्व विद्यालय http://gyanvigyanprasar.com Global School of Science and Philosophy Wed, 02 Mar 2016 11:12:12 +0000 en hourly 1 https://wordpress.org/?v=5.2.2 ये क्यॊं हो रहा है हमारे दौर में http://gyanvigyanprasar.com/2015/07/blog-post_120.html http://gyanvigyanprasar.com/2015/07/blog-post_120.html#respond Mon, 06 Jul 2015 11:36:00 +0000 इधर दो घटनायें ऐसी हो गईं हैं जिनसे मन बहुत दुखी हॊ गया है। उधर बिहार में कुछ काँवड़ियॊं ने अपनी धार्मिक अंध श्रद्धा के आवेश और आवेग में एक्सप्रेस ट्रेन को रोकने की कॊशिश की और उसमें मारे गये। उनकी ज़हालत इस कदर असीम थी कि वे ये भी न सोच पाये कि एक्सप्रेस …

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इधर दो घटनायें ऐसी हो गईं हैं जिनसे मन बहुत दुखी हॊ गया है। उधर बिहार में कुछ काँवड़ियॊं ने अपनी धार्मिक अंध श्रद्धा के आवेश और आवेग में एक्सप्रेस ट्रेन को रोकने की कॊशिश की और उसमें मारे गये। उनकी ज़हालत इस कदर असीम थी कि वे ये भी न सोच पाये कि एक्सप्रेस ट्रेन कॊ इस तरह से रॊक पाना किसी के लिए संभव नहीं है। भांग का सेवन करने वाले भगवान शिव के भक्त भी धर्म रूपी भांग की पिनक में रहे हॊंगे यकीनन।
उधर महाराष्ट्र की विद्वत नगरी पुणॆ में अंधश्रद्धा का
उन्मूलन करने में लगे दाभॊलकर साहब की हत्या कर दी गई है। ऐसे में क्या अब भी कॊई शक बच जाता है कि धर्म अफ़ीम नहीं है अगर तॊ न हॊ, मगर किसी न किसी तरह का नशा ज़रूर है।
ये बात यहाँ ग़ौर तलब है कि जिस तरह से बनारस उत्तर भारत में विद्वता का गढ़ रहा है उसी तरह विंध्य के उस पार पुणे नगरी विद्वानॊं की नगरी रही है और शास्त्रार्थ की काफ़ी सजीव परंपरा थी यहाँ कभी। वैसे भी ये नगरी भंडारकर ओरिएंटल रिसर्च इंस्टिट्युट की नगरी है। इस संस्थान ने रामायण और महाभारत का सबसे प्रामाणिक संस्करण तैयार किया है।
रामायण से रामायण का ही एक बड़ा रोचक प्रसंग याद आता है। इसमें ऋषि सत्यकाम जाबाल एक जगह खुद मर्यादा पुरूषॊत्तम भगवान राम से बहस करते हैं। उसमें वे साबित करते हैं खुद ईश्वर के सामने कि धर्म और ईश्वर की बातें बकवास है। मज़े कि बात ये है कि राम पूरे गौर से जाबाल के सारे तर्क सुनते हैं और उसके बाद खुद ये साबित करने कि कॊशिश करते हैं कि धर्म और भगवान की ज़रूरत है। (मगर ये नहीं कहते हैं कि भगवान वास्तव में हैं। किसी कॊ देखना हो तॊ देख सकते हैं। भंडारकर वाले रामायण में ये प्रसंग किंचित विस्तार से है, मगर सवर्त्र सुलभ गीताप्रेस वाले बाल्मिकी रामायण में भी ये प्रसंग बच गया है। अभी तक तो है आगे कि राम जाने।) हिंदू धर्म ध्वजधारी जिस तरह से अपनी ही परंपराऒं का सत्यानाश करने पर आमादा है, उसे देखते हुए अब तॊ कुछ भी पक्का नहीं दिखता है। इस सिलसिले में एक और वाकया है। भवभूति रचित उत्तर रामचरित में एक जगह गॊमाँस खाये जाने का जिक्र है और वॊ भी वशिष्ठ द्वारा। बाद में काल क्रम से जब हिंदू गाय की उपयोगिता के कारण पूजा करने लगे तॊ गाय की तॊ गाय को मारना और उसका माँस खाना पाप हॊ गया। इस बात कॊ विद्यानिवास मिश्र ने एक बार भरी सभा में बताया था। इसी कॊ लेकर एक बार बनारस की नगर विद्वत सभा में चर्चा हुई और ये जानने की कॊशिश की गई कि इस प्रसंग का क्या किया जाये। सारे नये पंडित इस हक में थे कि इस प्रसंग कॊ उत्तररामचरित से निकाल दिया जाना चाहिए और सभी संस्कृत प्रकाशकॊं को ये बता देना चाहिए कि आगे से वे इस वाकये कॊ न छापें। मगर सारे बुज़ुर्ग़ पंडितॊं ने इसका विरोध किया। आखिर में ये तय पाया गया कि भवभुति ने जॊ लिखा है वही सही है।)
ऐसी शानदार परंपरावाले देश कॊ इस पतन तक खींच लाने के लिए जो ताकतें ज़िम्मेदार हैं उन्हें अपने आप पर शर्म आनी चाहिए।
आज़ादी के 66 साल के बाद और लगातार धर्म निरपेक्षता और वैज्ञानिक चेतना के प्रचार प्रसार में लगे रहने के बाद भी हमें ये दिन इस देश में देखने कॊ क्यॊं मिल रहा है। यहाँ तॊ परंपरा रही है ‘कविर्मनीषी स्वयंभू’ की। ( मतलब कि एक तरफ़ कवि और मनीषी में और दूसरी तरफ़ की ईश्वर में कॊई फ़र्क नहीं है। उन्हॊंने जो बना दिया, जो कह दिया वॊ अकाट्य है। उस पर कॊई सवाल खड़ॆ नहीं कर सकता है।) हमारे नौ प्रमुख दर्शनॊं में से तीन जैन, बौद्ध और लोकायत नास्तिक यानि वेद निंदक और निरिश्वर दर्शन रहे हैं। ज़ाहिर है कि नई बौद्धिक परंपराऒं कॊ स्थापित करना तो दूर, हम पुरानी बौद्धिक परंपराऒं को भी सहेज कर नहीं रख पाये हैं।
इसलिए जिन लोगॊं ने इस तरह के कामॊं कॊ अंज़ाम दिया है उनकी निंदा तो हमें करनी ही चाहिए साथ में हमें अपनी आलोचना भी करनी चाहिए और देखना चाहिए कि हम ने गलती की कहाँ है।
मेरे ख्याल से गलती दो जगह हो गई। एक तो ये कि हमने ये मान लिया की सामाजिक असमानता को दूर किये बिना हम धर्म निरपेक्षता और वैज्ञानिक चेतना की ज़ंग कॊ, लड़ाई को जीत सकते है। अब सामाजिक असमानता सिर्फ़ धन-जन की या खेत मकान और पगड़ी धॊती की नहीं होती है। सामाजिक असमानता का एक बड़ा क्षेत्र खुद ज्ञान और विद्या तथा इल्म ओ हुनर का और दानिशमंदी का है। ये सही है कि खेत मकान की असमानता कॊ दूर सिर्फ़ सरकारें कर सकती हैं। मगर विद्या की असमानता कॊ दूर करने के लिए हम में से हर इंसान जो वैज्ञानिक चेतना और धर्म निर्पेक्षता का नाम जपता रहा है, कर सकता था कुछ न कुछ और अगर इस काम कॊ पिछले 66 सालॊं में किया जाता तॊ हमें आज ये दिन देखने कॊ न मिलते। आखिर ये वही देश है जहाँ एक बार जब आचार्य नरेंद्र देव अयोध्या से लोक सभा का चुनाव लड़ रहे थे तॊ उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री गॊविंद वल्लभ पंत ने चुनाव सभा में जा के कहा था’ अयॊध्या धर्म की नगरी है। यहाँ से नरेंद्र देव सा नास्तिक चुनाव कैसे जीत सकता है।’ इस पर उन्हीं के सरकार के शिक्षा मंत्री और संस्कृत के महान विद्वान डा संपूर्णानंद ने जा के वहीं एक अन्य सभा की अगले दिन और कहा’ संविधान नें ऐसी कॊई बात नहीं है जिससे ये अर्थ निकाला जाये कि नास्तिक चुनाव नहीं लड़ सकता है। इसलिए हमारे मुख्य मंत्री ने जॊ बात कही है वॊ गलत है।’
एक और वाकया है प्रभूदत्त ब्रह्मचारी का। उस समय के सब महान संतॊं ने उन्हें अपना समर्थ देकर उन्हें जवाहर लाल नेहरू के खिलाफ़ चुनाव लड़वा दिया। नेहरू ने कहा कि वे अब चुनाव प्रचार भी नहीं करेंगे अपने निर्वाचन क्षेत्र में। कहने की बात नहीं है कि उस चुनाव में ब्रह्मचारी जी महाराज की ज़मानत जब्त हो गई थी।
इस तरह से ये साबित होता है कि हम अपनी प्राचीन विरासत कॊ बचाने में तॊ नाकाम रहे ही हैं, हम अपनी हालिया विरासत का भी सत्यानाश कर चुके हैं।1967 में कई राज्यॊं में ग़ैर कांग्रेसी सरकार बनवा देने वाले डा लोहिया भी अपने को खुलेआम नास्तिक कहते थे और हर तरह के अंध विश्वास की खिल्ली उड़ाते थे।
एक और पेंच ये रह गया कि जिन लोगॊं ने भी यहाँ धर्म निरपेक्षता और वैज्ञानिक चेतना की बात की है बे सब के सब अक्सर विदेश पलट विद्वान और दार्शनिक और वैज्ञानिक थे तथा वे सब के सब तकरीबन अपनी भाषा भूल चुके थे और उन सब के चिंतन मनन की भाषा अंग्रेज़ी हॊ गई थी। आज भी कम ओ बेश यही हालत है। उधर धर्मांधतावादी जनता से जन भाषा में बात करते हैं और जो चाहते हैं वही करवा लेते हैं।
पिछले कई सालॊं का अनुभव रहा है हमारा कि जब भी ऐसी कॊई घटना हॊती तब ये अंग्रेज़ीदाँ धर्मनिर्पेक्ष और वैज्ञानिक तथा दार्शनिक चेतना से संपन्न लोग अपने अपने विश्वविद्यालयॊं और संस्थानॊं से बाहर आते हैं क्षण भर कॊ और एकाध बयान या एकाध भाषण देकर चले जाते हैं वापस अपने विश्वविद्यालयॊं और संस्थानॊं में। इसके बाद बीच में उनके बारे में कुछ ही पता नहीं चलता है। कई बार पूछॊ तॊ पता चलता है है कि वे कहीं विदेश में ज्ञान लाभ कर रहे हैं।
दुबारा वे फ़िर तभी नज़र आते हैं जब कॊई ऐसी घटना फ़िर से घट जाती है।
अब इस तरह के हवाई हमलॊं से बात नहीं बनेगी। इस देश में अब धर्म निर्पेक्षता और वैज्ञानिक चेतना तभी बच सकेगी जब विद्या और ज्ञान की ग़ैर बराबरी कॊ कम किया जायेगा तथा इसके लिए हम सब कॊ मिल कर सांस्थानिक इंतज़ाम करने हॊंगे। वैसे स्कूल कॉलेज़ और संस्थान खोलने हॊंगे जहाँ पर साल भर उस जगह की आम जनता के लिए खुलेआम कार्यक्रम हॊते रहें जिनमें उन्हें दुनिया भर के ज्ञान और विज्ञान के बारे में उनकी अपनी भाषा में बताया जाये। आज की तारिख में भी पूरी दुनिया की तरह भारत में भी सभी सरकारी विश्वविद्यालयॊं और कालेज़ॊं तथा स्कूलॊं में वैज्ञानिक चेतना से संपन्न और धर्म निरपेक्ष प्रज्ञा से लैस विद्वानॊं और दार्शनिकॊं का ही कब्ज़ा है। अबतक जो हुआ सो हुआ, आगे से भी ये सब अगर अपने अपने शहर में जनता के लिए खुले प्रवेशवाले सभाऒं में ज्ञान विज्ञान के विषयॊं पर बहस शुरू कर दें तॊ अगले कुछ ही बरसॊं में हालात सुधर जायेंगे। जब तक ऐसा नहीं हॊगा तब तक हमारे इक्का दुक्का जॊ कार्यकर्ता हॊंगे दाभॊलकर जैसे ठीक इसी तरह से मारे जाते रहेंगे। अबतक इस मामले में हमारे कॉलेज़ और विश्व विद्यालय कितने निकम्मे रहे हैं इसकी एक बानगी ये है कि 2009 आचार्य जगदीश चंद्र बसु की 150 सालगिरह का साल था और इस शहर दिल्ली में न जाने कितने विश्वविद्यालय और कॉलेज़ है। किसी ने अपने यहाँ भी कॊई कार्यक्रम न किया उन्हें याद करते हुए। बाहर आकर जनता के बीच भारत के इस महान बौद्धिक के बारे में जनता कॊ बताने की बात तॊ दूर रही। जबकि इंग्लैंड के क्राईस्ट कॉलेज़, कैंब्रिज़ में सालों भर कार्यक्रम चलते रहे थे, सिर्फ़ इसलिए कि आचार्य ने उनके यहाँ जा के कभी पढ़ाई की थी। ऐसी सूरत ए हाल में जो भी हॊ जाये, वॊ एक तरह से कम ही है। उत्तर भारत के बुद्धिजीवियॊं के बारे में हमारे मानस गुरू जगदीश जी एक बात कहते थे- इनके पास जाऒ तॊ ये कहने लगेंगे कि कॊई कुछ नहीं करता है। हमें स्कूल खॊलने चाहिए, सभायें करनी चाहिए चाहिए जनता में तार्किकता और वैज्ञानिक चेतना को बढ़ावा देने के लिए। मगर जैसे ही कॊई इनसे कहे हम खुद इसी तरह से चंदा करके एक स्कूल चला रहे हैं या वैज्ञानिक चेतना के ऊपर एक सभा करना चाहते हैं। हमें कुछ चंदा आप भी दे दें। ये सुनते ही उन्हें साँप सूंघ जायेगा। वे तुम्हें दस रूपये तॊ क्या दस पैसे भी न देंगे।’ मुझे लगता है कि उत्तर भारत का बुद्धिजीवी आज भी उसी तरह से सरकारी बुद्धिजीवी है। वॊ जॊ करेगा सरकारी पैसे से ही करेगा। अपने पैसे उसकी चेंट से न निकलेंगे। अक्सर तॊ वो इस तरह के काम सरकारी पैसे से भी नहीं करता। वो सिर्फ़ अपने लिए देश विदेश में ज्ञान लाभ करने में लगा रहता है। अब समय आ गया है जब वॊ अपनी तंद्रा और अपने आलस कॊ तथा अपने लोभ को छॊड़ॆ तथा ज्ञान लाभ और धन लोभ को भी त्याग के जनता के बीच ज्ञान दान के काम में लग जाये। नहीं तॊ कल को उसके कॉलेज़ॊं, संस्थानॊं तथा विश्वविद्यालयॊं की ऊँची दीवारॊं के बाहर का अंधकार इतना घना हॊ जायेगा कि उसका बाहर आ पाना मुश्किल हो जायेगा तथा अगर वॊ आ भी गया तॊ कॊई भी उसके साथ कुछ भी कर जायेगा। इससे भी बड़ा खतरा ये है कि ये बाहरी अंधेरा उसके विश्वविद्यालयॊं के भीतर भी घुस सकता है। शायद कुछ हद तक घुस चुका है। तभी तॊ विश्वविद्यालयॊं के चिंतक चिल्लाते रहते हैं और जनता भैस की नींद सॊई रहती है। उसे अपने बौद्धिकॊं के संघर्षॊं से कॊई मतलब नहीं होता है। हो भी क्यॊं, उसे भैंस भी तॊ इन्हीं बौद्धिकॊं ने बना रखा है।
एक और वजह याद आ रही है भारतीय समाज से वैज्ञानिक चेतना, जॊ थॊड़ी बहुत थी, उसके भी खत्म होने की। यही नहीं, आज के इस बौद्धिक समाज में अंदरूनी समालोचना की परंपरा भी खत्म हो चुकी है। आजकल ईसरॊ का अध्यक्ष कॊई राधाकृष्ण नाम का आदमी है। जब उसने ये पद सम्भाला था तब उसने गुरूवयुरप्पन के मंदिर में जा के अपने वजन के बराबर फूल का दान करवाया था। अपने वजन के बराबर फूल दान करने में और अपने वजन के बराबर सोना दान करने में क्या फ़र्क है। इसी तरह से अभी उसकी कुछ पदोन्नति हो गई है तो वॊ तिरुपति के मंदिर में गया हुआ था। मगर शर्म की बात है कि वैज्ञानिक समुदाय में से किसी ने भी उसके ऐसे सार्वजनिक धतकर्मॊं की निंदा न की। इसी तरह से ए पी जे अब्दुल कलाम जब राष्ट्रपति बने थे जॊ उनका सब से पहला सार्वजनिक दर्शन ब्रह्मकुमारियॊं के सम्मेलन के उद्घाट्न के सिलसिले में हुआ था। तब भी किसी वैज्ञानिक ने उनके इस धतकर्म की निंदा न की थी। अब समस्या ये है कि इस तरह की एक घटना जब हो जाती है, तॊ मेरे जैसे कार्यकर्ताऒं के पूरे जीवन के काम पर पानी फ़िर जाता है और कभी कभी ऐसे ही लोगॊं की चुप्पी के चलते दाभोलकर जैसा कॊई मारा भी जाता है।
ये अंदरूनी समालोचना ज़रूरी है। इस सिलसिले में एक प्रसंग डा राजेंद्र प्रसाद का है। जवाहरलाल के मना करने पर भी राष्ट्रपति होने के अपने अधिकार का इस्तेमाल करके उन्हॊंने सोमनाथ के मंदिर का उद्घाटन भी किया था और फ़िर बाद में एक बार बनारस में जा के पंडॊ के पैर भी छुए और उन्हें दान भी दिया। दोनॊं मौकॊं पर जवाहर लाल ने कहा’ ये काम भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष गणराज्य के राष्ट्र पति के योग्य नहीं है। उन्हॊंने और राम मनोहर लोहिया ने भी ये भी कहा कि जॊ आदमी किसी के पैर छू सकता है वॊ किसी कॊ लात भी मार सकता है। ये अंदरूनी समालॊचना ही उन दिनॊं नवजात भारतीय राष्ट्र की जान थी। मज़े की बात है कि इन सब के बाद भी दोनॊं ने बारह साल तक एक दुजे के साथ काम किया और दोनॊं की दोस्ती भी बदस्तूर कायम रही। आज दुख की बात ये है कि ये अंदरूनी समालोचना न राजनीति में बची है न विज्ञान में।
मेरे कहने का मतलब ये नहीं है कि वैज्ञानिकॊं को रातॊंरात नास्तिक हो जाना चाहिए। ऐसी माँग करना अपने आप में एक अवैज्ञानिक माँग होगी। मगर हम आज के इन वैज्ञानिकॊं से ये उम्मीद तो कर ही सकते हैं कि ये अपनी श्रद्धा का खुले आम दिखावा न करें। इस मामले में ये सर सी वी रामन से सीख सकते हैं। ये हज़रत निजी ज़िंदगी में सारे हिंदू कर्मकांड करते थे। मगर इतनी सफ़ाई से कि किसी को पता ही न था कि ये आस्तिक भी हैं।
इतनी बात पढ़ने के बाद हो सकता है कि आप के मन में सवाल हो’ अरे तॊ तुम क्या कर रहे हॊ?’
इसलिए मैं बता दूँ कि मैं निजी तौर पर अपने प्रयासॊं से अपने मित्रॊं की मदद से एक प्राथमिक विद्यालय चला रहा हूँ पटना के एक गाँव में। मैं ज्ञान विज्ञान प्रसार न्यास के तरफ़ से वैज्ञानिक और दार्शनिक और तार्किक विषयॊं के ऊपर हिंदी में व्याख्यान भी करवाता हूँ। आगे चल के उन्हें छपवाने की भी यॊजना है। ये सारे काम मैं अपने दोस्तॊं की मदद से करता हूँ। मैं किसी भी जी ऒ, एन जी ऒ या सी ओ से पैसे नहीं लेता। मगर इसमें मज़ेदार बात ये है कि अब तक दस साल में जानने के बाद भी अब तक किसी भी बौद्धिक ने इस काम में मेरी मदद के तौर एक नया पैसा नहीं दिया है। यहाँ तक कि मैंने कई बार फ़ेस बुक के बौद्धिकॊं के बीच भी इस बात कॊ फैलाया है, मगर किसी भी फ़ेसबुकिये बौद्धिक ने अब तक मदद कॊ हाथ नहीं बढ़ाया है। मेरा काम अब तक अपने मित्रॊं के धन से ही चल रहा है और ये सब के सब अधिकतर सरकारी नौकर हैं मेरी तरह। ये और बात है कि बौद्धिक बहसॊं में इसी वर्ग कॊ सबसे ज्यादा ग़ालियाँ मिलती है।
तो समय आ चुका है जब सिर्फ़ रोने से या गाने से या हाय हाय करने से काम नहीं चलेगा। जन शिक्षण सिर्फ़ सरकार का काम नहीं है। मुख्य रूप से ये बौद्धिकॊं का काम है। इस काम कॊ करने के लिए अगर हम आगे आयेंगे तभी बौद्धिक असमानता घटॆगी और देश में धर्म निर्पेक्षता और वैज्ञानिक चेतना कॊ स्थाई निवास मिल सकेगा। नहीं तॊ, ये वैज्ञानिक चेतना भी हमारे अधिकतर बुद्धिजीवियॊं और वैज्ञानिकॊं की तरह अनिवासी भारतीय ही ही रह जायेगी।

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पहचान का धर्म बनाम धर्म की पहचान http://gyanvigyanprasar.com/2015/07/blog-post_121.html http://gyanvigyanprasar.com/2015/07/blog-post_121.html#respond Mon, 06 Jul 2015 10:45:00 +0000 आज हर धर्म में तरह तरह के पहचान के लिए मारा मारी हो रही है। हर आदमी अपने आचरण के बदले अपने आवरण से ये बताने की कॊशिशॊं में लगा है कि वॊ कौन है, किस धर्म से है। इस सारे व्यापार में हुआ ये है कि सच्ची धार्मिकता का सत्यानाश या कहें कि सर्वनाश …

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आज हर धर्म में तरह तरह के पहचान के लिए मारा मारी हो रही है। हर आदमी अपने आचरण के बदले अपने आवरण से ये बताने की कॊशिशॊं में लगा है कि वॊ कौन है, किस धर्म से है। इस सारे व्यापार में हुआ ये है कि सच्ची धार्मिकता का सत्यानाश या कहें कि सर्वनाश हो गया है तथा नकली धार्मिकता पूरे उभार पर है। इसी के कारण ये भी हो रहा है कि हर धर्म आज अपनी आबादी और अपने साम्राज्य को भी बढ़ाने में लगा हुआ है। धर्म कॊ कुछ लोग सबसे बड़ा साम्राज्यवाद यूँ ही नहीं कहते हैं। हर धर्म का भगवान आज रानी विक्टॊरिया का क्लोन बना हुआ है जॊ ये कहने पे आमादा है कि हमारे राज्य में सूरज तक नहीं डूबता। जब ये बात अंग्रेज़ अपनी रानी के साम्राज्य के बारे में कहते थे तॊ उस समय ज़वाब में वी के कृष्ण मेनन ने इनसे ये कहने की हिम्मत थी : sun does not set in your empire as God cannot trust you in dark.
ये तो अच्छा है कि आज की तारीख में भी किसी भी धर्म के ईश्वर का साम्राज्य इतना बड़ा नहीं है वरना मुझे ये कहना पड़ता : In your religious empire, Sun does not set as mankind cannot trust your God in the dark.
शायद बात भी यही है। इसी कारण कभी भी सारी मानवता ने आज तक कभी किसी एक धर्म को नहीं अपनाया।
मैक्समूलर ने इसी संदर्भ में क्या खूब फ़रमाया थाः Even Gods and religions have their fates.
आज हर धर्म के वास्तविक अनुयायियॊं की संख्या घट गई है। ये वास्तव न के बराबर हॊ गई है। हर धर्म के जो भी सच्चे अनुयायी हैं वे आज वैज्ञानिक चेतना से संपन्न हो चुके हैं और उनका काम किसी धर्म गुरू के अनुशासन के बिना बखूबी चल रहा है।
बाकी जॊ जनता है वो अज्ञान की मारी है। उसका समुचित धार्मिक शिक्षण भी नहीं हुआ है। वो नाना प्रकार के बाबाऒं और गुरूऒं तथा फ़िरकॊ में फ़ँसी है। उसके लिए धर्म समाज में कुछ बेहतर ओहदा और दर्ज़ा हासिल करने का ज़रिया बन गया है। इसमें हर धर्म के दिखावटी गुरू उनकी मदद कर रहे हैं।
सो आज हर इंसान अपने पहनावे ओढ़ावे और दाढ़ी तथा केश से ये साबित करने की कवायद में लगा है कि वॊ किसी खास धर्म का है।
पहचान के इसी धर्म का एक नतीज़ा और है। हर धर्म आज सड़कॊं और अखाड़ॊं में आ चुका है अपने घरॊं और मंदिरॊं तथा मस्ज़िदॊ और गिर्जॊ और गुरूद्वारॊं से निकल के।
हर धर्म में नये नये किस्म की फ़ितुरी परंपराऒं कॊ जन्म दिया जा रहा है। धर्म कॊ आज राजनैतिक तथा सांस्कृतिक एवं आर्थिक सत्ता हासिल करने के औज़ार में बदल दिया गया है।
अफ़्रीकी मुस्लिम समाजॊं में औरतॊं का भी खतना करने की जॊ कवायद चल रही है, इसी पागलपन का नतीज़ा है।
कबीर ने पहचान के इसी धर्म को निशाना बना के कभी कहा थाः जॊ तू बाभन,बांभनी जाया, काहे न भीतरी जनेउ कराया।
जॊ तू तुरक तुरकनी जाया काहे न भीतरी खतना कराया।
जैसे किसी सामान के बनते ही कॊई बड़ा पूंजीपति उस पर सबसे पहले अपने नाम का और अपने ब्रांड का ठप्पा लगाता है उसी तरह किसी भी बच्चे के जन्म लेते ही उसके परिवार के धर्म गुरू उस बच्चे पर अपना ठप्पा लगाने आ जाते है।
उनके लिए हर नया बच्चा बस उनके आदेशॊं पर बिकने को तैयार एक माल होता है।
हर धर्म ने तरह तरह की पहचान बनाई है। जैसे किसी नये जानवर कॊ खरीद कर लाने के बाद ही उसे या तॊ नाथ दिया जाता है या दाग दिया जाता है, उसी तरह से पैदा होते ही हर बच्चे कॊ एक पहचान दे दी जाती है।
दर असल हमारे देश में ये सब जॊ हो रहा है उसकी वज़ह हम खुद है। हम ने सेकूलरिज़्म कॊ लॊकायत कहने के बज़ाय सर्वधर्म समभाव कह दिया। ये सर्व धर्म समभाव एक संतुलित साम्राज्यवाद के अलावे कुछ और नहीं है। इसका मतलब ये हो गया कि हिंदू के मामले में मुसलमान नहीं बॊलेगा और मुसलमानॊं के मामले में ईसाई या सिख नहीं बोलेगा। इससे हुआ ये कि भेड़ॊं की तरह हिंदू जनता, हिंदू धर्म गुरूऒं के हवाले कर दी गये और मुस्लिमॊं को इस्लामिक कानूनदानॊं के भरोसे छॊड़ दिया गया। यही बात बाकी धर्मॊं के लिए भी हॊ गई। सब ने अपने अपने क्षेत्र बांट लिए।
इस मामले को देख कर बारहा ये ख्याल आता है कि बीसवीं सदी के शुरू में कई साम्राज्यवादी ताकतॊं ने मिल के पूरी दुनिया कॊ आपस में कुछ इसी अंदाज़ में बंदरबांट कर लिया था ताकि उनके बीच आपस में युद्ध न हॊ। मगर ये शांति नकली थी और कुछ ही दिनॊं के बाद प्रथम विश्व युद्ध शुरू हॊ गया।
मुझे लगता है कि मानवता ने अगर चेत न मानी, इस चेतावनी पर गौर न किया तॊ धर्मॊं के बीच धर्म युद्धॊं का एक नया दौर फ़िर से शुरू हो सकता है। खास कर के इस मामले में ईसाई पादरियॊं और मुस्लिम उलेमाऒं से सावधान रहने की ज़रूरत है। ये दोनॊं सारी दुनिया पर अकेले एकछत्र राज करने पर आमादा हैं।
शुरूआत यहाँ से करनी होगी कि हमें इस तरह के बाहरी धार्मिक आवरणॊं को और बाहरी धार्मिक कृत्यॊं कॊ छॊड़ना होगा। हमें उस अंग्रेज़ी कहावत के अर्थ कॊ जन जन तक ले जाना होगा जिसमें ये कहा गया हैः it is irreligious to be religious यानि कि बाहरी तौर पर धार्मिक होना, एक अधार्मिकता है। नास्तिकता है।
पहचान के धर्म से आगे बढ़ के हमें धर्म के पहचान की ओर जाना हॊगा। सच पूछा जाये तॊ हम किसी कॊ हिंदू तभी मानें जब बिना किसी भी बाहरी दिखावे या आडंबर तथा आवरण धर्म कर्म या पहचान के कॊई बस अपने आचरण मात्र से ये जता दे कि वो सच्चा हिदू है और जॊ उसका भगवान है, वही ईसाईयॊं का और मुस्लिमॊं का भी भगवान है। ये और बात है कि वे अभी इस सत्य तक नहीं पहुँच पाये है। इसी तरह से अगर कॊई मुस्लिम बिना किसी बाहरी प्रदर्शन और बिना किसी रोज़े या नमाज़ के हमें ये समझा दे कि वो सच्चा मुसलमान है तथा उसका अल्लाह बाकी सब लोगॊं का भी अल्लाह है तथा उसका अल्लाह किसी हिंदू या ईसाई से भी उतना ही प्यार करता है जितना कि किसी मुस्लिम से तथा ये और बात है कि वॊ अभी तक अल्लाह की सीधे पुजा नहीं करता है।
गीता में कृष्ण ने अपने अंदर ही सारे ब्रह्मांड कॊ और ब्रह्म कॊ पैबस्त मान के कहा था कि तुम किसी की पूजा करो अंत मे वॊ मेरे ही पास आती है।
यही बात बाकी सब भगवान और ईश्वर-परमात्मा कह दें तॊ धर्म कॊ साम्राज्यवाद से मुक्ति मिल जायेगी, उसका पूजीवादी चरित्र भी समाप्त हो जायेगा। साथ में सारे भगवानॊं और सभी अल्लाहॊं तथा सब परमात्माऒं को भी अपने अपने धर्म के धर्म गुरूओं की कैद से छुट्टी मिल जायेगी। अब ये आप पर है कि आप अपने साथ साथ अपने धर्म और अपने ईश्वरॊं और अल्लाहॊं कॊ धर्म गुरूऒं तथा उलेमाऒं की कैद असे आज़ाद करें या उन्हें उन्हीं के आधीन रहने दें।

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सनातन (हिंदू) धर्म से उसकी सुंदरता न छीनें http://gyanvigyanprasar.com/2015/06/blog-post_123.html http://gyanvigyanprasar.com/2015/06/blog-post_123.html#respond Mon, 15 Jun 2015 13:14:00 +0000 आज कल जिसे देखॊ वही सनातन धर्म का अलम्बरदार बन के सामने  रहा है। बाबा रामदेव से लेकर अबिजीत मिश्र जैसे लोग घमासान मचाये हुए हैं। कॊई मोहन भागवत बना फ़िर रहा है तॊ कॊई गिरिराज सिंह बना हुआ है। मजे कि बात ये है कि इनमें से किसी कॊ सनातन धर्म की सुंदर परंपराऒं …

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आज कल जिसे देखॊ वही सनातन धर्म का अलम्बरदार बन के सामने  रहा है। बाबा रामदेव से लेकर अबिजीत मिश्र जैसे लोग घमासान मचाये हुए हैं। कॊई मोहन भागवत बना फ़िर रहा है तॊ कॊई गिरिराज सिंह बना हुआ है। मजे कि बात ये है कि इनमें से किसी कॊ सनातन धर्म की सुंदर परंपराऒं का ज्ञान भी नहीं है। आईए मैं आज आप कॊ दॊ कथायें सुनाता हूँ जिसका जिक्र श्रीमद्भागवत में है। पहले हम आपकॊ नारद मॊह कि कथा सुनाते हैं।
नारद मॊह
एक बार हुआ यूँ कि नारद कॊ अपने विरागी और वितरागी होने पर बड़ा घमंड हॊ गया। वे भगवान विष्णु के परम भक्त थे। सो विष्णु ने हँसी हँसी में उनके गर्व कॊ चूर करना चाहा। सॊ उन्हॊंने एक माया नगरी बनाई। उसके राजा की बेटी बड़ी सुंदर थी। नारद ने उसे देखा तॊ मोहित हो गये। उन्हें पता चला कि उस लड़की का स्वयंवर होने वाला है। नारद तुरंत भगवान विष्णु के पास गये। कहा कि मुझे उस लड़की से प्रेम हो गया है। दुनिया में सबसे सुंदर आप है। हे हरि आप मुझे अपना रूप ही दे दीजिए। भगवान विष्णु ने ही माय नगरी बनाई थी। उन्ह्वें कुछ और ठिठॊली सूझी। हरि का एक अर्थ संस्कृत में बंदर होता है। सो भगवान ने नारद का सारा बदन अपने जैसा कर दिया मगर चेहरा बंदर का बना दिया। स्वयंवर उसी दिन था। सो नारद आनन फ़ानन में पहुँच गये वहाँ। देखा कि भगवान विष्णु वहाँ पहले से विराजमान थे। स्वयंवर हुआ। कन्या ने विष्णु कॊ ही वरा। नारद उचक उचक कर अपना चेहरा दिखाते रहे। लोग डर के मारे अपनी हँसी छुपाते रहे। अंत में जब विष्णु चले गये, किसी ने निराश नारद से कहा,’ प्रभू, आप अपना चेहा जा के पानी में देख लें।’ नारद कॊ जब सच्चाई पता चली तॊ नारद बहुत ग़ुस्सा हुए। उन्हॊंने भगवान विष्णु कॊ श्राप दिया,’ तुम भगवान रहॊ या परमात्मा बनॊ। मैं तुम्हें श्राप देता हूँ कि जिस धरती पर तुमने माया नगरी बनाई थी उस धरती पर तुम्हें जन्म लेना पड़ॆगा। जिस तरह से तुमने मेरा प्रिया से बिछॊह करवाया है, उसी तरह से तेरा भी अपनी प्रिया से बिछॊह होगा। और तुमने मेरा चेहरा बंदर का बना दिया था, सॊ अंत में बंदरॊं की मदद से ही तुम अपनी पत्नी कॊ वापिस पा सकॊगे। भागवतकार का कहना है कि इसी वजह से विष्णु का रामावतार हुआ जिसमें विष्णु ने खुशी से एक दासी पुत्र नारद के सारे श्रापॊं कॊ स्वीकार किया।
एक बार हुआ यूँ कि नारद कॊ अपने विरागी और वितरागी होने पर बड़ा घमंड हॊ गया। वे भगवान विष्णु के परम भक्त थे। सो विष्णु ने हँसी हँसी में उनके गर्व कॊ चूर करना चाहा। सॊ उन्हॊंने एक माया नगरी बनाई। उसके राजा की बेटी बड़ी सुंदर थी। नारद ने उसे देखा तॊ मोहित हो गये। उन्हें पता चला कि उस लड़की का स्वयंवर होने वाला है। नारद तुरंत भगवान विष्णु के पास गये। कहा कि मुझे उस लड़की से प्रेम हो गया है। दुनिया में सबसे सुंदर आप है। हे हरि आप मुझे अपना रूप ही दे दीजिए। भगवान विष्णु ने ही माय नगरी बनाई थी। उन्ह्वें कुछ और ठिठॊली सूझी। हरि का एक अर्थ संस्कृत में बंदर होता है। सो भगवान ने नारद का सारा बदन अपने जैसा कर दिया मगर चेहरा बंदर का बना दिया। स्वयंवर उसी दिन था। सो नारद आनन फ़ानन में पहुँच गये वहाँ। देखा कि भगवान विष्णु वहाँ पहले से विराजमान थे। स्वयंवर हुआ। कन्या ने विष्णु कॊ ही वरा। नारद उचक उचक कर अपना चेहरा दिखाते रहे। लोग डर के मारे अपनी हँसी छुपाते रहे। अंत में जब विष्णु चले गये, किसी ने निराश नारद से कहा,’ प्रभू, आप अपना चेहा जा के पानी में देख लें।’ नारद कॊ जब सच्चाई पता चली तॊ नारद बहुत ग़ुस्सा हुए। उन्हॊंने भगवान विष्णु कॊ श्राप दिया,’ तुम भगवान रहॊ या परमात्मा बनॊ। मैं तुम्हें श्राप देता हूँ कि जिस धरती पर तुमने माया नगरी बनाई थी उस धरती पर तुम्हें जन्म लेना पड़ॆगा। जिस तरह से तुमने मेरा प्रिया से बिछॊह करवाया है, उसी तरह से तेरा भी अपनी प्रिया से बिछॊह होगा। और तुमने मेरा चेहरा बंदर का बना दिया था, सॊ अंत में बंदरओं की मदद से ही तुम अपनी पत्नी कॊ वापिस पा सकॊगे। भागवतकार का कहना है कि इसी वजह से विष्णु का रामावतार हुआ जिसमें विष्णु ने खुशी से एक दासी पुत्र नारद के सारे श्रापॊं कॊ स्वीकार किया।
सबसे बड़ा भगवान कौन
दूसरी कथा कुछ यूँ है कि एक बार ऋषियॊं मुनियॊं में विवाद हो गया कि ब्रह्मा, विष्णु और महेष में सबसे बड़ा भगवान कौन है। जब विवाद किसी भी तरह से हल न हुआ तो इसका फ़ैसला करने का काम महर्षि भृगु कॊ दिया गया। भृगु सबसे पहले ब्रह्मा के पास गये। उनसे पहले भद्दे भद्दे मज़ाक किए, ब्रह्मा ने ऋषि पद का मान रखने के ख्याल से कुछ न कहा। चुपचाप सुननते रहे। मगर इसके बाद भृगु ने ब्रह्मा कॊ हर तरह की ग़ालियाँ देनी शुरू कर दी। अब ब्रह्मा कॊ बर्दाश्त न हुआ और उन्हॊंने भृगु कॊ अपने गणॊं की मदद से अपनी सभा से बाहर उठवा के फ़ेकवा दिया। इसके बाद भृगु गये महेष के पास। लगे भूत भावन परम पावन भगवान शिव कॊ ग़ालियाँ देने। कुछ देर तक सुनने के बाद भगवान शिव ने उन्हें अपना त्रिशूल ले कर खदेड़ दिया।
फ़िर गये विष्णु के पास। वहाँ जा के भी उन्हॊंने वही सब किया। पहले भद्दे मज़ाक किए। फ़िर ग़ालियाँ दी। मगर भगवान विष्णु अपनी खास अदा से मंद मंद मुस्काते रहे। भगवती लक्ष्मी भी उनके पास बैठी हँसती रहीं। भृगु का ग़ुस्सा और बढ गया। वे आगे बढ़ॆ और विष्णु के सीने पर जोर से एक लात मारी। भगवान विष्णु ने उनके पैर पकड़ लिए और कहा,’ ऋषि वर के पैरॊं में चॊट तॊ न लगी।’ ये कह के विष्णु ने भृगू के पैर सहलाने शुरू किए।
लौट के भृगु ने फ़ैसला सुनाया’ तीनॊं देवॊं में विष्णु सबसे बड़ॆ है। इसी कथा से वॊ कहावत भी निकली हैः क्या घटी गयॊ विष्णु कॊ, जॊ भृगु ने मारी लात/।’
ये है सनातन धर्म का वो स्वरूप जिसमें भगवान को भक्त से और भक्त कॊ भगवान से मज़ाक करने की पूरी छूट रहती है। इतना खुला सा धर्म है ये। इसमें तॊ धरती पर जनमने वाले हर प्राणी कॊ सनातन धर्म का माना गया है। कहा जाता है कि इस धरती पर जन्म लेने की चाहत देवॊं में भी होती है। यही नहीं, सनातन धर्म में धरती के किसी एक टुकड़ॆ कॊ पवित्र नहीं कहा गया है। इसके लिए पूरी धरती के कण कण  में भगवान का वास माना गया है। इस धर्म की अगर कॊई बुराई है तॊ वॊ छुआछूत है और जातपात है।
ऐसे धर्म के नाम पर कभी किसी फ़िल्म से खफ़ा होना तॊ कभी धर्मांतरण की बात करना तॊ कभी घर वापसी के नाम पर हगामा करना अधर्म है।
अगर यही सब करना है तॊ फ़िर कह दें कि आप कॊ अपने पुराणॊं में कॊई आस्था नहीं है। आप के आर्य समाजी बंधू तॊ कहते भी यही है। आज आपकॊ आर्य समाज से बड़ा प्यार हो चला है। कभी जा के सत्यार्थ प्रकाश कॊ पढ के देखें। फ़िर आप के पता चलेगा कि दयानंद स्वामी ने राम, कृष्ण और शिव तथा दुर्गा के बारे में क्या कह रखा है।
अरे भाई कॊई भाजपा के नाम पर या आर एस एस के नाम पर ये सब कहे तॊ उससे हम निबट लेंगे। उनका तॊ सनातन धर्म में कॊई विश्वास ही नहीं है। उनका हिंदू धर्म से कॊई लेना देना ही नहीं है। उनका मतलब हिंदूत्व से है। सच तॊ ये है कि उन्हॊंने इसे कभी छिपाया भी नहीं है। इनके सबसे बड़ॆ सिद्धांतकार सावरकर कहते थे कि हिंदूत्व उनके लिए एक geopolitical  भूराजनैतिक फ़लसफ़ा है। यानि कि एक राजनैतिक सिद्धांत है। इस्लाम की तर्ज़ पर वे हिंदू धर्म को भी एक राजनैतिक धर्म बनाना चाहते थे। तय बाट है कि वे इसमें विफल रहेंगे। जिस सनातन धर्म का पाच हज़ार साल में कुछ न बिगड़ा, उसका ये क्या खा के कुछ बिगाड़ लेंगे।
इस लिए मुझे तॊ ये लगता है कि ये सारा विरोध सिर्फ़ इसलिए हो रहा है कि पीके फ़िल्म का मुख्य अभिनेता आमीर खान है। इसके साथ साथ घरवापसी या धर्मांतरण का भी सारा चक्र इसलिए चल रहा है कि जनता का ध्यान असली मुद्दॊं से भटकाया जा सके।
अब जनता भटक रही है इसका एक कारण ये भी है कि हमारी नई पीढ़ी आज सांस्कृतिक रूप से ज़ाहिल है। मैंने जिन दो कथाऒं का जिक्र ऊपर किया है उसके बारे में आज की पीढी कुछ नहीं जानती है। सनातन धर्म का मतलब ही होता है नूतन और पुरातन का मेल। इस धर्म ने हमेशा नई चीज़ कॊ अपनाया है। कुछ राजनैतिक हिंदूत्व धर्मियॊं के चलते इस परंपरा कॊ चॊट न आज तक पहुँची है, न आगे पहुँचेगी। हिंदू धर्म के धर्म ग्रंथॊं के बारे में जॊ सबसे अच्छी बात है वॊ ये है कि सबके सब एक खुले पाठ वाले ग्रंथ है। इनमें कभी भी कुछ भी जॊड़ा जा सकता है, बशर्ते उस समय का सनातनी समाज उसके हक में हो। ये एक तरह से अलिखित संविधान की तरह है। इसी से इस धर्म की सुंदरता है। हज़ारॊं हज़ार मत मतांतर वाला ये सनातन धर्म एक अजायब घर भी है और एक फ़ैशन शॊ भी है। सबसे बड़ी बात ये है कि इस धर्म में भगवानॊं से हँसी मज़ाक की परंपरा रही है। इस धर्म का भगवान किसी दूर दराज के ब्लैक होल में नहीं है। हम तॊ बाज दफ़े एक दूजे कॊ भी भगवान कहते है। यही वह धर्म है जिस में भक्ति का एक रूप भगवान की निंदा करना भी है। इस लिए एक बार फ़िर से मैं ये कहुँगा कि आप लोग धर्न की आड़ में राजनीति करना छॊड़ दें।

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शहीद ए आज़म भगत सिंह http://gyanvigyanprasar.com/2015/06/blog-post_124.html http://gyanvigyanprasar.com/2015/06/blog-post_124.html#respond Mon, 15 Jun 2015 12:56:00 +0000 28 सितंबर, 1907 कॊ जन्म और 23 मार्च 1931 कॊ फ़ाँसी। आखिर क्या था 23 साल के इस नौजवान में जिसकी याद आते ही दिल ओ दिमाग़ में मानवजाति की आज़ादी का सपना जगने लगता है! जिसकी याद आते ही मन के आकाश में एक छॊटा सा भगत सिंह ध्रुवतारे की तरह जगमगाने लगता है! …

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28 सितंबर, 1907 कॊ जन्म और 23 मार्च 1931 कॊ फ़ाँसी। आखिर क्या था 23 साल के इस नौजवान में जिसकी याद आते ही दिल ओ दिमाग़ में मानवजाति की आज़ादी का सपना जगने लगता है! जिसकी याद आते ही मन के आकाश में एक छॊटा सा भगत सिंह ध्रुवतारे की तरह जगमगाने लगता है!

याद करने पर एक छॊटा सा बालक याद आता है जॊ अपने पिता के साथ एक दिन खेत में गया था। इधर पिता अपनी लहलहाती फ़सल को देख के मगन थे और उधर बालक ज़मीन खोदने में लगा था। पिता ने देखा तॊ पूछा,’ ये क्या कर रहे हॊ? बच्चे ने कहा’ ज़मीन खॊद रहा हूँ और इस में बंदूक रोप कर बंदूक की फ़सल उगाऊँगा और फ़िरंगी कॊ भगाऊँगा।’ ऐसा हॊता क्यॊं नही। ये बालक सरदार अजित सिंह और सरदार स्वर्ण सिंह का भतीजा था। इसके दोनॊ चाचा आज़ादी के दीवाने थे। पिता किशन सिंह भी सुराजी थे। ऐसे में बच्चे का इंकलाबी होना तॊ तय ही था।

ऐसा ही एक दूसरा किस्सा है। जब इनके चाचा जेल में ही बीमार हो गये और अंग्रेज सरकार ने तब भी उन्हें रिहा नहीं किया तॊ इनकी चाची रॊने लगीं थी। इस पर सात साल के भगत सिंह ने कह,’ आप चिंता न करें। मैं बड़ा हॊ कर इसका बदला लूँगा और अग्रेज़ॊं क देश से भगा दूँगा।’ उस बालक की ऐसी बातॊं को सुन के रॊती हुई औरतें भी हँस पड़ीं।

इसी तरह से एक बार जब स्कूल में बच्चॊं से पूछा गया कि वे बड़ॆ हॊ कर क्या बनेंगे; तॊ किसी बच्चे ने कहा कि वॊ डाक्टर बनेगा, किसी ने कहा कि  वॊ सरकारी अफ़सर बनेगा, तॊ किसी ने व्यापारी बनने की इच्छा ज़ाहिर की। एक ने तॊ कहा कि वो बड़ा हो के शादी करेगा। भगत की बारी आई तो उसने कहा,’शादी करना कौन सी बड़ी बात है। ये काम तो कॊई भी कर सकता है, मैं तो बड़ा हो के फ़िरंगियॊं को देश से निकाल बाहर करूँगा।’
इनका बचपन गाँव में बीता था और पढ़ाई में ये पिछड़ न जायें इसलिए इनके पिता ने इनके लिए एक गुरू मुकर्रर कर दिया। अब कुछ ही दिनॊं में एक प्राथमिक पाठशाला में जॊ कुछ भी पढ़ाया जाता था, सब कुछ भगत सिंह ने सीख लिया। इसके बाद गुरू ने कहा,’ ये तॊ सब कुछ पहले से ही ज्नता है, इसे क्या सिखाऊँ। भगत सिंह ने पढ़ाई को बड़ी गंभीरता से लिया तथा हर विषय में अपनी बढ़त बनाई। इतिहास, भूगॊल और ग़णित सब में उनकॊ बहुत अच्छे नंबर आये सिर्फ़ अंग्रेज़ी में उन्हें 150 में से 68 नंबर आये। मगर भगत भी कॊई कम चालाक थॊड़ॆ थे। उन्हॊंने अपने दादा जी कॊ खत लिखा कि 150  में से 50 नंबर आने पर ही बच्चे पास हो जाते हैं, मेरे तो 68 नंबर आये हैं। मैं तॊ बहुत अच्छे नंबरॊं से पास हुआ हूँ।’

भगत सिंह बचपन से ही बहुत प्रेमी जीव थे। परिवार से एक बड़ॆ खेतिहर खानदान के थे। ऐसे में एक दिन एक दर्ज़ी आ कर भगत सिंह के कपड़ॆ दे गये। माँ ने पूछा कि जो आदमी कपड़ॆ दे गया था वॊ कौन था? भगत सिंह ने कहा,’वो मेरा दोस्त है।’ माता विद्यावती ने कहा,’क्या एक दर्ज़ी तेरा दोस्त है?”भगत ने कहा,’ हाँ, माँ; इस गाँव का हर आदमी मेरा दोस्त है।’

1919 में जब जालियाँवाला बाग़ हत्या कांड हुआ तॊ भगत सिंह बारह साल के थे। उन्हें अपने परिवार की क्रांतिकारी विरासत क पता चल चुका था। उन्हें ये भी पता चल चुका था उनके दादा जी ने उन्हें देश के नाम वक्फ़ कर दिया है, दान कर दिया है। उस दिन भगत सिंह हिल गये। उस दिन स्कूल खत्म होने के बाद तुरंत घर भी नहीं आये। उसी दिन वे उस जगह पर गये और एक बॊतल में शहीदॊं के खून से सनी हुई मिट्टी कॊ ले आये। घर के लोग काफ़ी चिंतित हो गये थे। जब घर लौटे तो तॊ माता और छॊटी बहन ने पूछा तो उन्हॊंने वह बोतल दिखाई उन्हें और कहा कि देखॊ अंग्रेज़ॊं ने इस तरह से मारा है हमारे लोगॊं को। उस दिन भगत ने खाना नहीं खाया। उसी दिन भगत ने भी तय किया कि अब वॊ स्वाधीनता संग्राम में हिस्सा लेगा। उन्हॊंने पिता से इज़ाज़त माँगी। देश भक्त पिता ने तुरंत इज़ाज़त दे दी। भगत उसके बाद भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस के आंदोलन में आ गये। उस समय विदेशी कपड़ॊं के बहिष्कार का आंदोलन चल रहा था। भगत ने उसमें बढ़ चढ़ के हिस्सा लिया और उसी समय से सिर्फ़ खादी पहना शुरू किया।

1922 तक काँग्रेस के साथ रहे भगत सिंह। मगर चौरीचौरा में 22 लोगॊं के मारे जाने के बाद गाँधी जी ने आंदोलन वापस ले लिया। उसी समय 19 साल साल के क्रांतिकारी करतार सिंह कॊ अंग्रेज़ॊं ने फ़ाँसी दे दी थी, इस बात का सत्याग्रहियॊं ने ज़रा भी विरॊध नहीं किया। इन घटनाऒं से  भगत को लगा कि आज़ादी का ये खालिस अहिंसक रास्ता सही नहीं है। इन ज़ालिम अंग्रेज़ॊं से लड़ने के लिए कभी कभी हिंसा ज़रूरी है। इस दौर में उन्हॊंने नेशनल कॉलेज़, लाहौर में दाखिला ले लिया और खूब पढ़ाई लिखाई शुरू की। दुनिया के हरेक क्रांतिकारी आंदोलन के इतिहास कॊ पढ़ा। इस दौर में उन्हॊंने कॉलेज़ के लाईब्रेरियन से दोस्ती गाँठ ली थी और उससे उन्हें नई से नई किताब के पुस्तकालय में आते ही पता चल जाता था और उसे वे तुरंत पढ जाते थे। यही नहीं, उन्हॊंने नौजवानॊं से दोस्ती करनी शुरू की तथा दिन भर कॉलेज़ की पढ़ाई के बाद शाम को उनके साथ दुनिया भर की क्रांतियॊं के ऊपर चर्चा भी करते थे। इनका ये तरीका उस समय बहुत काम आया जब उन्हॊंने बाकायदे क्रांतिकारी पार्टी में काम करना शुरू कर दिया था। उस समय ये अपने लाईब्रेरियन से एक बात और पूछने लगे। वे लाईब्रेरियन से ये जान लेते थे कि कौन सा छात्र किस तरह की किताब पढ़ रहा है। बाद में उसी आधार पर वे उस छात्र से बात करते थे और उसे पार्टी में लाने की कोशिश करते थे।

भगत सिंह के बारे में एक नामालूम सा तथ्य ये भी है कि वे महान नेता होने के साथ साथ एक अच्छे अभिनेता भी थे। नेशनल कालेज़ में अपनी पढ़ाई के दौरान उन्हॊंने ‘राणा प्रताप’ तथा ‘सम्राट चंद्रगुप्त’ और ‘भारत दुर्दशा’ जैसे नाटकॊं में अभिनय भी किया थ। उनके अभिनय कॊ देख कर एक प्रोफ़ेसर ने कहा था,’ ये लड़का बहुत बड़ा आदमी बनेगा।’

एक विकल्प की तलाश में भगत सिंह ने दुनिया के हर देश के स्वतंत्रता संग्राम और क्रांतिकारी इतिहास कॊ पढ़ लिया था। मगर इसके बाद वे सिर्फ़ इससे संतुष्ट नहीं रह सके। उन्हॊंने भारत के क्रांतिकारियॊं के बारे में भी पता लगाना शुरू किया। इसी सिलसिले में उनकी जान पहचान हिंदूस्तान रिपब्लिकन आर्मी के लोगॊं से हुई। इधर उसी समय उनकी शादी की चर्चा करनी शुरू कर दी थी उनकी दादी जी ने। लड़की भी देख ली गई थी। आखिरी फ़ैसला होने ही वाला था कि क्रांतिकारी दल के नेता ने उनकॊ कानपुर बुला लिया। भगत कॊ अब फ़ैसला करना था। भगत ने घर छॊड़ दिया। और अपने पिता के नाम वॊ खत लिखा जो अब एक क्लासिक खत बन चुका। उसमें उन्हॊंने कहा,’ मेरे लिए शादी विवाह नहीं है। मेरे लिए तॊ देश सेवा ही है। बचपन में ही आप ने मुझे देश के लिए वक्फ़ कर दिया था।’
इसके बाद भगत सिंह घर छॊड़ के कानपुर पहुँच गये।

अपने ज्ञान, अपनी मेधा तथा अपनी सूझ बूझ के कारण भगत सिंह ने ज़ल्दी ही इस पार्टी में अपनी जगह बना ली। वे एक तरह से पार्टी के सिद्धांतकार बन गये। चंद्रशेखर आज़ाद नेता थे, मगर लोकप्रियता में भगत ही सबसे आगे थे। सो जब संसद में बम फेंकने की बात आई, तो बतौर सेनापति चंद्रशेखर आज़ाद ने ये तय किया कि उसमें दूसरे लोग जायेंगे। भगत की ज़रूरत पार्टी की नीतियॊं और उसके फ़लसफ़े कॊ चाक चौबंद करने के लिए कहीं ज्यादा है। मगर भगत सिंह कॊ उन्हीं दिनॊं एक लड़की अच्छी लगने लगी थी। वॊ भगत कॊ देख के अक्सर मुस्कुरा देती थी और भगत भी उसे देख के मुस्कुरा देते थे। दोस्तॊं से बात छिपाई नहीं थी भगत ने। सो सुखदेव ने ताना मारा,’अब तुम प्रेम के चक्कर में पड़ गये हॊ। इसलिए तुम मरने से डरने लगे हॊ। इसीलिए तुमने संसद (सेंट्रल लेज़िस्लेटिव असेंबली) में बम फेंकने वाली टीम में अपना नाम नहीं रखा है। नौजवान भगत को अपने क्रांतिकारी भाई की बात चुभ गई। उन्हॊंने पार्टी की बैठक दुबारा बुलवाई और दादा यानि आज़ाद से जिद करके उस टीम में अपना नाम डलवाया। मगर भगत अपने रूमानी मिज़ाज़ कॊ ले कर ज़रा भी लज़्ज़ित नहीं थे। अपने दोस्त सुखदेव के नाम लिखे गये एक खत में उन्हॊंने कहा है कि प्रेम के प्रति हमारा नज़रिया आर्य समाजी-शुद्धतावादी नहीं हो सकता है। रूमानी और रूहानी प्रेम आत्मा कॊ एक नये फ़लक पर ले जाते हैं तथा इंसान की आत्मा को निर्मल तथा निश्छ्ल बनाते हैं।

नौजवानॊं के लिए क्लासिक बने इस खत में भगत ने कई ऐसे क्रांतिकारियॊं की मिसाल दी है जिन्हें अपनी प्रेमिका से क्रांति के रास्ते पर बल ही मिला और जिन्हें अपनी प्रेमिका से अपने क्रांति कार्य के लिए लगातार प्रेरणा भी मिलती रही तथा जिनकी प्रेमिका कभी भी उनके क्रांतिकार्य में बाधा नहीं बनीं।

भगत लगातार पढ़ते रहे, साथ में लिखते रहे। भारतीय क्रांतिकारी आंदॊलन में संभवत सबसे ज्यादा लेखन और जन जागरण भगत सिंह ने ही किया था। ये एक दार्शनिक क्रांतिकारी थे। इनका कहना था कि समाज में आज़ादी के साथ साथ समानता के लिए भी काम करना होगा। वर्ना गॊरे अंग्रेज़ के बदले काले अंग्रेज़ कॊ ला के बिठा देने का कॊई फ़ायदा नहीं है। ये उनके लेखन और उनके जन जागरण का ही कमाल था कि हिंदुस्तान रिपब्लिकन आर्मी का नाम बदल के हिंदुसतान सोसलिस्ट रिपब्न्लिकन आर्मी कर दिया उनके मित्रॊं ने।

इसके बाद सांडर्स हत्या कांड, संसद में बम फेकने की घटना, बहुत लंबी गिरफ़्तारी और उस गिरफ़्तारी के दौरान 116 दिन का अनशन ताकि इन्हें भी अंग्रेज़ राजनीतिक कैदियॊं वाल दर्ज़ा दिया जाये; जैसे अनेक काम किए इन्हॊने। जेल भी भी लगातार पढ़ते रहे, लिखते। क्रांति की तलवार की धार पर विचारॊं से लगातार शान चढ़ाते रहे, उसे तेज बनाते रहे। जनता कॊ जगाते रहे। यहाँ तक कि अपना मुकदमा भी खुद लड़ा। जब भी मुकदमे के दिन अदालत जाते,’ इंकलाब ज़िंदाबाद’ नारे लगाते जाते। माफ़ी के लिए लिखने के लिए दबाव दिए जाने पर जॊ खत लिखा वॊ भी क्लासिक खत ही है। उसमें उन्हॊंने लिखा कि माफ़ी की कॊई ज़रूरत ही नहीं है। आप अपने लोगॊं कॊ मुझे फ़ाँसी देने के लिए तैयार करके रखिए।
बहुत कम लोगो ये पता है कि भगत खुद एक अच्छे खासे शायर भी थे। उनका एक शेर अक्सर याद आता हैः
उसे कत्ल करने की आदत है मुझे फ़ना होने का शौक,
मर्ज़ी मेरी भी वही है जो मेरे सैय्याद की है।
ऐसे में क्या गज़ब की दुनिया के सबसे बड़ॆ साम्राज्य के मालिकॊं के मन में ऐसा भय समा गया कि तयशुदा दिन 24 मार्च से एक दिन पहले ही यानि की 23 मार्च कॊ ही उन्हॊंने हमारे इस धीर वीर और गंभीर महानायक कॊ फ़ाँसी दे दी। अंतिम समय तक भगत सिंह पूरी तरह से निर्द्वंध थे अपने इस फ़ैसले कॊ लेकर। जब फ़ाँसी देने के लिए उन्हें बुलाने कॊई आया तॊ उम्हॊंने कहा ‘रूक जाओ, तनिक देर, अभी एक क्रांतिकारी दूसरे क्रांतिकारी से मुलाकात कर रहा है।’ असल में, उस समय वे लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे और उसके आखिरी पन्ने पर थे।

दुनिया के इतिहास में सिर्फ़ एक और ऐसी मिसाल है जिसमें किसी महामानव ने सब कुछ सोच समझ के मौत कॊ गले लगाया था। ये उदाहरण सुकरात का है। एक और समानता है कि दोनॊं के सामने ये विकल्प था कि वे चाहते तॊ अपना जीवन बचा लेते। मगर उन्हॊंने ऐसा नहीं किया। इसकी वज़ह थी कि उनकी मौत दर असल उनके जीवन का ही एक चरम उत्कर्ष थी। उनके सारे जीवन के कर्म और वचन का ही एक विस्तार थी उनकी मौत। उनके जीवन के आदर्शॊं का ही एक देवत्वीकरण थी उनकी मौत।

इसीलिए आज भी दुनियाभर में ज्ञान विज्ञान को पाने और उसे फैलाने में लगा हर इंसान अपने में एक छॊटॆ से सुकरत कॊ पाता है और हर तरह के बंधन से खुद कॊ आज़ाद करने तथा आज़ादी की अलख जगाने की कोशिश में लगा हर मानव अपने में एक नन्हें से भगत सिंह कॊ देखता है।

इसी मायने में भगत सिंह आज सबसे ज्यादा मौज़ूँ हैं तथा इसी वज़ह से हज़ार जातियॊं और धर्मॊं में बंटा होने के बाद भी अपना देश कम से कम इस एक बात पर एकमत है कि भगत सिंह शहीद ए आज़म हैं। जिस तरह से सुकरात ने ज़मीन के नीचे से लेकर आसमान से ऊपर तक की हर एक चीज़ कॊ ज्ञान के दायरे में लाने की कॊशिश की थी; उसी तरह से भगत सिंह ने इंसान कॊ हर तरह की गुलामी के आज़ाद करने कोशिश की थी।
अपने फ़लसफ़े के हिसाब से भगत सिंह अपने को अनार्किस्ट कहते थे। ये शब्द ग्रीक भाषा से आया है जिसमें आर्कॊन का अर्थ होता है बराबर इंसानॊं में पहला, यानि कि फ़र्स्ट अमंग इक्वल; अनार्किस्ट का मतलब हो गया कि जो इतना भी भेद न माने। यानि कि हर हाल में सबकॊ एक समान माने, किसी को न अपने से छॊटा माने, न ही किसी को अपने से बड़ा माने। तो भगत सिंह कॊ याद करने का सबसे अच्छा तरीका यही है कि हम सब अपने अंदर एक प्यारे से अनार्किस्ट कॊ पैदा करे। अंत में भगत सिंह  कॊ बहुत ही प्रिय एक शेर से अपनी बात खत्म करना चाहूँगाः
खुदा के आशिक़ तो हैं हजारों, बनों (वनॊं) में फिरते हैं मारे-मारे
मै उसका बन्दा बनूंगा जिसको खुदा के बन्दों से प्यार होगा।

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धर्म या मज़हब के बारे में मार्क्स के ख्याल तथा आज के ज़माने में उनकी ज़रूरत http://gyanvigyanprasar.com/2015/05/blog-post_127.html http://gyanvigyanprasar.com/2015/05/blog-post_127.html#respond Fri, 22 May 2015 13:44:00 +0000 http://gyanvigyanprasar.com/uncategorized/%e0%a4%a7%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%ae-%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%ae%e0%a5%9b%e0%a4%b9%e0%a4%ac-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%87-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%ae%e0%a4%be/ धर्म की सतत आलोचना करते रहना ही आलॊचना का सतत धर्म है। दुख की बात है कि भारत में आज धर्म की आलोचना नहीं हॊ रही है। आज हर तरह के अंध विश्वास जन जीवन में फैलते जा रहे हैं। मगर कॊई इनके खिलाफ़ कुछ भी नहीं कर रहा है। वास्तव में मार्क्स धर्म की …

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धर्म की सतत आलोचना करते रहना ही आलॊचना का सतत धर्म है। दुख की बात है कि भारत में आज धर्म की आलोचना नहीं हॊ रही है। आज हर तरह के अंध विश्वास जन जीवन में फैलते जा रहे हैं। मगर कॊई इनके खिलाफ़ कुछ भी नहीं कर रहा है। वास्तव में मार्क्स धर्म की समालोचना कॊ फ़लसफ़े का सबसे ज़रूरी काम मानते थे। वे इसे क्रांति कर्म का पहला कदम मानते थे। हेगेल की किताब ‘ फ़िलॉसफ़ी ऑफ़ राईट ‘ की भूमिका के तौर पर उन्हॊंने जॊ भी लिखा था वॊ धर्म के बारे में उनके सिद्धांतॊं का एक तरह से निचॊड़ है। मैं सबसे पहले मार्क्स के धर्मसंबंधी इस लेख के विचारॊं का अनुवाद रखना चाहता हूँ: ‘जैसे ही हम स्वर्ग और परमात्मा तथा धर्मवेदी के सिद्धांतॊं का खंडन करते हैं वैसे ही इंसान के नापाक वज़ूद की जॊ भयंकर ग़लती ह्या वह नष्ट हॊने कॊ आ जाती है। हमारे ऐसा करते ही वही इंसान जॊ अब तक धार्मिक स्वर्ग की अति काल्पनिक दुनिया में जी रहा था तथा जिसमें वॊ अपने लिए किसी अतिमानव की तलाश कर रहा था; वह अब किसी भी तरह से सिर्फ़ अपने आप के ख्याल या अपनी खुदी के ख्याल से संतुष्ट नहीं होगा क्यॊंकि अब तक उसके मन में अपने बारे में कॊई ख्याल ही नहीं था, वॊ अब तक अपने लिए भी एक ना मौज़ूद इंसान था। इस लिए जब एक बार वॊ धर्म तथा स्वर्ग के ज़ाल से बाहर आ जायेगा तॊ अपना सही और असली वज़ूद खोजेगा।’
”किसी भी धार्मिक या ग़ैर धार्मिक समालॊचना की बुनियाद ये हैः इंसान ने धर्म कॊ बनाया है। मज़हब ने मानव कॊ नहीं बनाया है।। धर्म वास्तव में उस इंसान की निज चेतना है या खुदी है तथा निज – अभिमान या खुद्दारी है जिसने अब तक खुद कॊ पाया ही नहीं है या पाने के बाद खुद को फ़िर से खॊ दिया है।’
दुनिया की धार्मिक परंपराऒं में ये बात कही गई है कि अगर भगवान कॊ पाना है तॊ खुद कॊ मिटा दो। अगर जीवन में सच्चिदानंद कॊ पाना है तॊ अपने को खत्म कर दो। खुदा कॊ पाना है तॊ खुदी कॊ मिटा दॊ।
इस मार्क्स यहाँ कह रहे हैं कि अगर इस जीवन में सुख पाना है तॊ खुद कॊ पा लो और ये तब तक नहीं होगा जब तक कि तुम खुदा कॊ खत्म न कर दो।
इसके आगे उसी लेख में मार्क्स फ़िर कहते हैं:  मगर इंसान कॊई इस संसार के बाहर बैठा हुआ कॊई परम जीव नहीं है। वॊ इसी संसार का आदमी है जो कि किसी राजसत्ता के अधीन किसी समाज में रहता है। यही राजसत्ता तथा समाज मिल कर धर्म को बनाते हैं। ये धर्म इस संसार की ही एक ऊलटी चेतना है। ऐसा इस लिए है कि ये संसार ही एक उलटा संसार है। धर्म इसी उलटॆ संसार का महासिसिद्धांत है, इसी संसार की एक सर्वज्ञ किताब है। इसी संसार का एक लोकप्रिय तर्क है। इसी संसार का आध्यात्मिक सम्मान संस्थान है। इसी संसार का उत्साह है। इसी संसार का नैतिक औचित्य है। इसी संसार का पवित्र पूरक है। इसी संसार में सतॊष करने का तथा इसी संसार जीने का न्याय-निर्णय है। यह वास्तव में इंसान के सत्त का अतिकाल्पनिक वज़ूर है क्यॊं कि वास्तव में मानव के सत्त अब तक सच्चे रूप में कहीं मौज़ूद ही नहीं रहा। इस लिए धर्म के खिलाफ़ संघर्ष वास्तव में उस संसार के खिलाफ़ संघर्ष है जिससे धर्म नाम की गंध आती है।’
यहाँ पर अपने कबीर भी बरबस याद आते हैः साधॊ, देख जगत बौराना, साँच कहूँ तॊ मारन धावे, झूठे जग पतियाना।’
एक बार फ़िर से मार्क्स के पास चलते हैं: ‘धार्मिक क्लेश या पीड़ा दरअसल एक ही साथ वास्तविक पीड़ा की कॊ सहना तॊ है ही साथ में ये वास्तविक पीड़ा से एक विद्रोह भी है। धर्म वास्तव में दलित प्राणी की आह भरी पुकार है। एक बेदिल और बेरहम संसार का दिल है तथा बेजान हालात की जान है। ये जनता के लिए अफ़ीम है।’
यहाँ अफ़ीम कॊ लेकर बड़ी बात उठती है और ये कहा जाता है कि मात्र्क्स ने अफ़ीम शब्द का इस्तेमाल धर्म की निंदा करने के लिए किया था। दर असल एक अन्य सिलसिले में जिस तरह पूँजीवाद के नाश के लिए बात करने से पहले जिस तरह से मार्क्स पूंजीवाद के चरित्र का बखूबी बखान करते हैं और उस सिलसिले में सारे सामंती ढ़ाँचॊ कॊ तॊड़ने के पूंजीवाद की तारीफ़ भी करते हैं। उसी तरह से यहाँ ध्रम कॊ खत्म करने की बात करने के पहले मार्क्स धर्म की एक उपयोगिता बता रहे हैं। उन्नीसवीं सदी तक युरॊप में अगर किसी कॊ कही भी कॊई लाईलाज़ दर्द होता था तॊ उससे आराम देने के लिए हकीम लोग उसे अफ़ीम देते थे।  मार्क्स ने यहाँ पर धर्म के लिए अफ़ीम शब्द का इस्तेमाल इसी रूप में किया था। मार्क्स कह रहे हैं कि इस दुनिया में इतना दुख दर्द है कि धर्म के नशे के बिना इस दर्द कॊ सह पाना मुश्किल है। धर्म बेजान हालात की जान है इसे समझने के लिए विद्यापति का वॊ गीत याद करेः दुख ही जनम ले लीं , दुख ही गंवअलीं की सुख सपनॊ नहीं भील हॊ हो भोलानाथ नाथ, कखन हरब दुख मॊर हे भॊला नाथ।’ मज़ा ये है कि होश सम्भालने के बाद से मरते दम तक जनता इसे गाती रहती है।मगर भोलानाथ दुख नहीं हरते हैं।
इसी लेख में मार्क्स आगे कहते हैं: सुख के छ्लावे के रूप में धर्म के नाश करने की मांग करने का मतलब है कि सच्चे सुख की माँग की जाये। अपने हालात के बारे मेंइस छलावे कॊ छॊड़ने के लिए लोगॊं कॊ पुकारने का मतलब है कि उनसे उन हालात कॊ छॊड़ने के लिए कहा जाये जिनमें ऐसे छलावॊं की ज़रूरत हॊती है।
इसलिए धर्म की समालॊचना का मतलब ये है कि भ्रूण रूप से आँसुऒं की उस घाटी की निंदा की जाये जिसका की प्रकाशमान मुकुट है धर्म।’
इस समालोचना या निंदा ने इस ज़म्ज़ीर में उग आये काल्पनिक फूलों कॊ इस लिए नहीं चुना है कि अब इंसान इस ज़ंज़ीर कॊ बिना किसी कल्पना या सतॊष कॊ ढॊता रहे। इस ने इन काल्पनिक फूलॊं की ओर इसलिए इशारा किया है कि इंसान अब इस ज़ंज़ीर कॊ तॊड़ कर उतार फ़ेंकेगा तथा सजीव और सच्चे फूल चुनेगा। धर्म की आलोचना से इंसान इंसान के चारॊं तरफ़ का धार्मिक भुलावा तथा छलावा नष्ट हॊ जाता है तथा इसके बाद वह खुद सोचने लगता है और खुद अपने मन से अपने काम करने लगता है तथा  अपने चारॊं तरफ़ के संसार के वज़ूद कॊ खुद बनाता है एक ऐसे इम्सान की तरह जिसने अपने भ्र्म और भुलावे  कॊ छॊड़ दिया है तथा अपनी खुदी कॊ अपने अहसास कॊ पा लिया है। धर्म एक नकली सूरज की तरह किसी इंसान के चार्चारॊं तरफ़ त्यभी तक घूमता है जब तक कि इंसान खुद अपने आप के चारॊं तरफ़ नहीं घूमने लगता है।’
ज़ाहिर है कि ऐसे में हमारे लिए सबसे पहले ये ज़रुरी है कि हम पहले खुद कॊ इस भुलावे और छलावे से पुरी तरह निकालें और उसके बाद दूसरॊं कॊ भी इसके बाहर निकलने में मदद करे। एक नये वज़ूद का निर्माण तभी हॊ सकेगा।
मार्क्स यहीं पर नहीं रूकते हैं धर्म की आलोचना कॊ ज़रूरी बताते हुए इसी लेख में वे यह भी कहते हैः इसलिए इतिहास का ये काम है कि एक जब जब ये परलोक का सच खत्म हॊ जाये, ग़ायब हॊ जाये, तॊ उसकी जगह पर इस संसार के सच कॊ स्थापित किया जाये। फ़िलॉसफ़ी कॊ ये काम ज़ल्दी से ज़ल्दी करना चाहिए। यही काम फ़िलॉसफ़ी के लिए इतिहास की सेवा में हो सकता है। एक बार जब इंसान कॊ खुद से ही अजनबी बना देने वाले पावन और पाक रूपॊं से नकाब हट जाये तो फ़िर फ़िलॉसफ़ी का ये काम होगा कि वो मानव को अपने आप से ग़ैर बना देने वाले सभी अपावन और नापाक रूपॊं पर से भी मुखौटा हटा दे।
इस तरह से हम देखते हैं कि स्वर्ग की आलोचना असल में धरती (के हालात) की आलोचना है तथा धर्म की समालॊचना वास्तव में कानून या विधिविधान की आलोचना हाय तथा देव धर्म शास्त्र की आलोचना वास्तव में राजनीति की आलोचना है।यहाँ आप सब कॊ बचपन से अब तक हर मौके पर सुनी जाने वाली कहावत की याद आ गई होगी कि सब विधि का विधान है या कि सब खुदा की मर्ज़ी है या फ़िर ये कि गॉड्स विल बी डन। इसी तरह तुलसी दास कि वो चौपाई भी आप ने सुनी हॊगी:
सुनहु भरत भावी प्रबल विलपि कहै मुनिनाथ,
हानिलाभ, जीवन मरण, जस अपजस विधि हाथ।
मार्क्स की बात किस कदर सही है इसका अंदाज़ा आप इसी से लगा सकते हैं कि ऐसी कहावतें हर संस्कृति में है। किसी ने अबतक ये तक पूछने की कॊशिश नहीं की कि जब सबकुछ भगवान के ही हाथ में है तॊ फ़िर इंसान के हाथ में क्या है?
ज़ाहिर बात है कि विधि की आलोचना किए बिना आप विधान की आलोचना नहीं कर सकते हैं।
इस लेख के अंत में मार्क्स कहते हैः रैडिकल या क्रांतिकारी हॊने का मतलब जड़ तक जाना है। मगर इंसान की हालात के मामले में जड़ खुद इंसान है। इस लिए ये ज़रुरी है कि इंसान की बदहाली की जड़ यानी धर्म कॊ जड़ से खत्म कर दिया जाये।धर्म की आलॊचना आखिर कार हमें इस सिद्धांत तक लाती है कि इंसानॊं के संसार में इसान ही सबसे ऊपर है। इसलिए वैसी हर चीज़ तथा वैसे हर संबंध कॊ खत्म करना हॊगा जो इंसान कॊ पतित बनाती है, लाचार बनाती है, उसे ग़ुलाम बनाती है या कि उसे अनदेखा करती है तहा घृणित बनाती है।’
सो ये ज़ाहिर है कि हर तरह से धर्म की आलोचना करना हम सब का काम है। ऐतिहासिक रूप से देखें तो हिंदी क्षेत्र में इस काम कॊ राहुल सांकृत्यायन तथा भगवत शरण उपाध्याय तथा रांगेय राघव के बाद किसी ने भी लोकप्रिय भाषा में इस काम कॊ  नहीं किया है। ऐसे में क्या गज़ब आज पूरी गॊबर पट्टी सांप्रदायिकता तथा अध विश्वास की चपेट में है।
जबकि मार्क्स सारी ज़िंदगी धर्म के बारे में कुछ न कुछ लिखते रहे, कहते रहे।
अपने छात्र जीवन में ही एक लेख प्रतियोगिता में हिस्सा लेने के लिए खिखे गये एक लेख में मार्क्स कहते हैं: इंसान के दिव्यता ने एक महान मकसद दिया है। वॊ मकसद है अपनी और मानव जाति की तरक्की के लिए काम करना। मगर उस दिव्य शक्ति ने ये इंसाणॊं पर छॊड़ दिया है कि वॊ किस तरह से और किन साधनॊं से अपने इस मकसद कॊ हासिल करे। ये भी उसी के ऊपर छॊड़ दिया है उस दिव्य शक्ति ने कि इस मकसद कॊ हासिल करने के लिए इंसान समाज में अपने लिए कौन सा रूतबा या दर्ज़ा चुने जॊ कि उसके मकसद के सबसे ज्यादा समुचित है तथा समाज में किस हैसियत से वॊ खुद के और मानवता के उत्थान के लिए सबस अच्छा काम कर सकता है।’
एक स्कूली छात्र हॊते हुए भी मार्क्स यहा इंसान की अपनी इच्छा की आज़ादी का सिद्धांत्त यहाँ दे ही देते हैं।  आप कॊ पता ही होगा कि मार्क्स ने अपनी डॉक्टरी की थीसिस एपिक्युरस नाम के एक नास्तिक दार्शनिक पर लिखा था।
इस थीसिस की भूमिका में मार्क्स प्रोमेथियस कॊ याद करते हैं तथा कहते हैं कि प्रेमेथियस फ़िलॉसफ़ी के इतिहास में सबसे बड़ॆ संत हैं तथा सबसे बड़ॆ शहीद भी। प्रोमेथियस ग्रीक पुराण कथाऒं के ऐसे नायक हैं जिन्हॊंने देवताऒं की खिलाफ़त कर के भी इंसान कॊ आग जलान सिखाया था तथा और भी कई कलाऒं कॊ सिखाया था ताकि मानवॊं का जीवन कुछ आसान हो जाये। मगर देवराज द्यौस पितर कॊ ये मंज़ूर नहीं था सो उसने प्रोमेथियस कॊ बांध कर युराल पर्वत पर डाल दिया था।
इसी में मार्क्स फ़िलॉसफ़ी के सबसे बड़ॆ और ज़रूरी काम की निशानदेहि करते हुए कहते हैं: जब तक इस विश्व विजयी तथा परम स्वतंत्र दिल में खून की एक बूद भी बची रहेगी तब तक फ़िलॉसफ़ी कभी भी अपने आलोचकॊं का ज़वाब एपिक्युरस के इन शब्दॊं में देने से नहीं चुकेगीः भीड़ द्वारा पूजे जाने वाले देवॊं कॊ नकारने इंसान नहीं, बल्कि भीड़ द्वारा पूजित देवॊं के आगे सिर को झुकाने वाला इंसान; अपावन और अपवित्र है।”
एक और दूसरा सूत्र वाक्य भी फ़िलॉसफ़ी के लिए मार्क्स लगे हाथ दे देते हैं:
फ़िलॉसफ़ी कभी भी अपने दिल की इस बात को नहीं छिपाती है कि उसने प्रोमेथियस के इस इकरारनामे कॊ अपने दिल से लगा रखा हैःसीधे सपाट शब्दॊं में मैं देवॊं के इस दस्ते से नफ़रत करता हूँ।’
इसी में मार्क्स आगे कहते हैं कि ये वाक्य फ़िलॉसफ़ी का घॊषणा पत्र है, फ़िलासफ़ी का अपना इकरार नामा है। ये इसका अपना कहना है कि ये हर तरह स्वर्गिक और पार्थिव यानि आसमानी और ज़मीनी देवॊं कॊ नहीं मानती है तथा इंसान की अपनी आत्म चेतना कॊ ही सबसे दिव्य और भव्य मानती है।’
अब चूँकि इन्हीं वज़हॊं से फ़िलॉसफ़ी कॊ जनता के बीच वो जगह या सम्मान नहीं मिल पाता है और बहुत सारे लोगॊं कॊ इस पर बहुत भलभली छुटटी है कि फ़िलॉसफ़ी के साथ अगर ऐसा हो रहा है तॊ अच्छा ही है। मार्क्स कहते हैं कि आय्से लोगॊं के लिए भी एक बार फ़िर से प्रोमेथियस ही काम आते हैं। तथा फ़िलॉसफ़ी लाल बुझक्कड़ॊं कॊ प्रोमेथियस के हि शब्दॊं में कहती है : एक बात बात तय जानॊ, मैं अपनी इस दुभार्ग्य पूर्ण हालत के बदले, तेरे देव राज द्यौस पितर की ग़ुलामी कतई नहीं मंज़ूर करूगा। मेरे लिए इस चट्टान का नौकर होना ज्यादा अच्छा है, बज़ाय इसके कि मैं तेरे पिता द्यौस पितर का विश्वसनीय बालक बनूँ।’
इसके बाद एक अन्य लेख में मार्क्स परमात्मा या भगवान के अस्तित्व के बारे दिए जाने वाले तर्कॊं का खंडन करते हैं। इसमें सबसे पहले वे हेगेल के इस तर्क काह खंडन करते हैं कि चूँकि सृष्टि में दुर्घटनाये या अचानक होने वालि घटनाये नहीं होती हैं इसलिए कॊई अचल या अचूक चीज़ तॊ है और वॊ अटल चीज़ तॊ परमात्मा ही हो सकती है। इस में मार्क्स कहते हैं कि यहाँ हेगेल एक ऐसे वकील की तरह व्यवहार कर रहे हैं जॊ अपने मुवक्किल कॊ दॊषी सिद्ध होने से बचाने के चक्कर में खुद ही अपने मुद्दई कॊ मार डालता है। मार्क्स का कहना है कि यहा एक बार हेगेल फ़िर से उलटी बात कहते है। धर्म वाले तो अब तक लगातार यही कहते र्हे कि इस घटनाऒं और दुर्घटनाऒं से भरी दुनिया में सिर्फ़ भगवान ही एक गारंटी है।
इसके बाद एक और बात कह जाति है भगवानॊं के बारे में। लोग कहते हैं कि चूँकि मै इसके बारे में सच्चे तौर पर सोच सकता हूँ इसलिए ये भी सच्चा है। मार्कस यहा।म पर एक बार फ़िर से बड़ी मज़ेदार तरीके से खंडन करते है। वे कहते हैं कि इस हिसाब से तॊ ग्रीकॊं से लेकर यहुदियॊं तक के सारे भगवान सच हो जायेंगे। अल्लाह कॊ मानने से पहले अरब वाले जिन देवॊं कॊ मानते थे वे सब सच्चे हो जायेंगे। ईसाइ बनने से पहले युरॊप वाले जिन देवॊं को मानते थे वे सब भी सच्चे हॊ जायेंगे। इस लिए इस मामले में कांट महॊदय का तर्क थॊथा है। इस हिसाब से तॊ कॊई ये भी मान सकता है कि उसके पास चाँदी के सौ सिक्के हैं। अब अगर किसी के भी मनमर्ज़ी तथा निजी मगर वास्तविक सोच कॊ सही मानना हॊ तो फ़िर उस आदमि के लिए ये सिक्के उतने हि सच्चे हो जायेंगे जितने कि  वास्तविक सिक्के होते। इसके बाद वॊ इन्हें सच मान के उसी हिसाब से कर्ज़ भी ले बैठेगा। उसकी कल्पना इस मामले में ठीक उसी तरह से काम करेगी जिस तरह से परमात्मा के मामले में मानवता की कल्पनाऒं ने काम किया है।  यही नहीं। यहाँ तॊ वास्तविक सिक्कॊं ने भी वही काम किया है जिसे कि काल्पनिक भगवान ने किया है। क्या वास्तविक सिक्कॊं का वास्तव में कॊई वास्तविक मूल्य हॊता है। ज़ाहित्र है कि नहीं होता है। उसका भी मूल्य दर असल कलप्ना में ही होता है। किसी आय्से देश में कागज़ के नॊट ले जा के देखिये लोग आप की कल्पना पर हँसेंगे। इसी तरह से अपने देवॊं के साथ दूसरे देश में जाइये जहाँ दूसरे देवॊं की पूजा होती है। वहाँ भी आप पर लोग इसी तरह से हँसेंगे। लोग कहेंगे कि आप अति कल्पना शीलता तथा अमूर्तन के शिकार हैं। जब एक देश के देवॊं का दूसरे देश में ये हाल हो जाता है तीऒ फ़िर सोचिए कि उनका उसदेश में क्या हाल हॊगा जहाँ विवेक तथा बुद्धि का राज है। वहाँ पहुँचने के बाद तॊ ये सारे देवी देवता लापता ही हो जायेंगे।
परमात्मा के अस्तितव के आरे में एक अन्य तर्क का भी मार्क्स खंडन करते हैं तथा ये कहते हैं कि कुछ लोगॊं के मुताबिक इंसान की आत्म चेतना ही परमात्मा के होने का सबसे बड़ा सबूत है परमात्मा के होने का। मगर मार्क्स कहते हैं कि ये तॊ सबसे बड़ा प्रमाण है परमात्म के न होने का। ये ब्ट परमात्मा से संबंधित साड़े ख्यालॊं को नकार जाती है। हॊना तॊ चाहिए था कि कोई कहे कि चूँकि इस दुनिया की रचना बहुत ही बुरे तरीके से हुई है इसलिए भगवान है क्यॊंकि तब वॊ इसे सुधारने की कोशिश कर सकता है।  ये भी कॊई कहे तॊ बात समझ में आ सकती है’ चूँकि दुनिया में विवेक का अभाव है, इस लिए परमात्मा है क्यॊंकि उसके पास बुद्धि ह्या और वॊ सबकॊ बुद्धि देने की कोशि कर रहा है।’ कॊई चाहे तॊ ये भी कहसकता है कि परमात्मा है क्यॊंकि इस दुनिया में कॊई चेतना ही नहीं है, सो परमात्मा इसे चेतअना देने की कॊशिश कर रहा है।’ मगर ये सब कहने का मतलब क्या है’ जिसे ये दुनिया बिना विवेक के दिखती है, वह खुद ही बिना विवेक के है और भगवान उसी के लिए लिए वज़ूद में है कि उसे विवेक दे सके।’या फ़िर इसका मतलब ये कहना हो जायेगा कि विवेक का न हॊ होना ही, परमात्मा के अस्तित्व है।’
इस तरह से मात्र 23 साल की उम्र में ही मार्क्स दुनिया के सामने इस सवाल कॊ दार्शनिक  भाषा में रख देते हैं कि या सर्वशक्तिमान हॊ सकता है या फ़िर सर्वज्ञ हॊ सकता है। दोनॊं होना उसके बस में नहीं है। अगर वॊ सर्वज्ञ है तॊ इस दुनिया में इतने अन्याय के बने रहने का बस एक ही कारण हॊ सकता है कि या तॊ वॊ भला नहीं है या फ़िर सर्व शक्तिमाण नहीं है। दूसरे अगर वॊ सर्व शक्तिमान है तॊ होगा, मगर सर्वज्ञ और भला नहीं है क्यॊंकि पता हॊने के बाद भी दुनिया कॊ इस बुरी हालत में कॊई सर्वज्ञ भगवान नहीं छॊड़ॆगा।
मार्क्स युरॊप के नव जागरण के आखिरी महादैत्य थे। उन्हॊंने धर्म कॊ खकम से करने की कॊशिश की थी और वे चाहते थे कि ऐसी कोशिश होती रहे। मगर इस मामले में मार्क्स ज्ञान और आलोचना समालोचना का ही सहारा लेना चाहते थे। इस मामले में ज़ोर ज़ब्वरदस्ती उन्हें पसंद नहीं थी। मार्क्स ने एक बार धर्म के विरूद्ध कुछ लिखने पर रोक लगा देने पर लिखा था कि ये खुद धर्म के ही सबसे बड़ॆ सिद्धांत के खिलाफ़ है। मार्क्स के अनुसार धर्म का सबसे बड़ा सिद्धांट ये है कि कि इंसान का अपना मन परम पावन तथा अलंघनीय है। मार्क्स का कहना है कि इस तरह से तॊ हम परमात्मा के बदले सेंसर बॊर्ड कॊ अपने कर्म्पं का मुंसिफ़ बना देते हैं। हमारे कर्मॊं का फ़ैसका अब परमात्मा के बदले सेंसर वाले करेंगे। इससे बड़ी धर्म विरूद्ध बात क्या हो सकती है।
मार्क्स पश्चिमी दार्शनिकॊं में से सबसे ज्यादा एपिक्युरस को पसंद करते थे। उनके बाद उनकी पसंद थे लुक्रेशियस। दोनॊं ही नास्तिक और धर्मविरोधी दार्शनिक थे।
पश्चिम में ईसाईयत कॊ एक मानवतावादी धर्म बताने की ज़बरदस्त परंपरा थी। मार्क्स ने इसके ऊपर भी अपनी कलम चलाई तथा ये कहा कि ईसाईयत में ऐसा कुछ भी नहीं है।
उन्हॊंने कहाः (1)सामाजिक ईसाईयत ने पुराने ज़माने में ग़ुलामी कॊ सही ठहराया, मध्य काल में कृषी दासता का समर्थन किया तथा आजकल जब भी ज़रूरत हॊ आधुनिक सर्वहारा के शोषण का समर्थन करते हैं बशर्ते कि सर्व हारा कॊ कुछ भीख मिल जाये।
ये मार्क्स की आलॊचनाऒं का ही नतीज़ा था कि पश्चिम में लिबरेशन थिओलॉज़ी जैसी चीज़ पैदा हुई थी ईसाईयत में।
(2) सामाजिक ईसाईयत के सिद्धांतॊं के मुताबिक एक शासक और एक शॊषित वर्ग का होना ज़रूरी है। तथा शॊषित के लिए उनके पास सिर्फ़ ये सदिच्छा है कि शासक लोगॊं के मन में शोषितॊं के प्रति कुछ न कुछ दया का भाव जगेगा।
(3) ईसाईयत के सामाजिक सिद्धांत में इस धरती पर हॊने वाले सारे अन्याय का मुआवज़ा ग़रीबॊं कॊ स्वर्ग में मिल जायेगा तथा इसी लिए हम इन सारे अन्याय कॊ धरती पर ज़ारी रहने की अनुमति दे सकते हैं।
(4) ईसाईयत के सामाजिन सिद्धांत में शॊषितॊं पर अनाचारियॊं के सारे अनाचार या तॊ प्रथम पाप या किसी अन्य पाप की सज़ा हैं या फ़िर परीक्षा है उन शॊषिताऒं की जिसे कि परमात्मा ने तय किया है ताकि उस आग में जल के वे पवित्र हि कर निउकल सकें और उनका उद्धार हो सके।
(5) ईसाईयत के सामाजिक सिद्धांत कायरता, आत्म घृणा,आत्म हीनता तथा ग़ुलामी और हीनता का उपदेश देते हैं।  वे सर्वहारा से नीच लोगॊं के सारे गुणॊं की उम्मीद करते हैं जबकि सर्वहारा कॊ या नीच वर्ग के लोगॊं कॊ रोटी से भी ज्यादा ज़रूरत साहस तथा आत्म विश्वास और गर्व के भाव तथा आज़ादी की है।
(6) ईसाईयत के सामाजिक सिद्धांत कपटी और चापलूस हैं तथा सर्वहारा आज क्रांतिकारी हो गया है।
धर्म कॊ इस अपूर्ण संसार का एक पूर्ण और मनमौज़ी प्रतिबिंब या एक आदर्श छवि मानते हुए एक अन्य लेख में मार्क्स कहते हैं:वास्तविक संसार का धार्मिक प्रतिबिंब किसी भी हाल में आखिर तौर पर तभी खत्म होगा जब जब इंसान के दैनिक जीवन का व्यावहारिक कामकाज इंसान कॊ एक दम पूरी तरह से समझ में आने के लायक तथा तथा विवेकशील और बुद्धिमता पूर्ण संबध दे सकेगा अपने साथी इंसानॊं के साथ और कुदरत के साथ।
किसी भी समाज की जॊ जीवन प्रक्रिया होती है वह उसके भौतिक उत्पादन की प्रक्रिया पर निर्भर होती है। मगर इसका रहस्य मय नकाब तब तक नहीं हट पाता है जब तक कि उत्पादन के इस काम कॊ स्वतंत्र रूप से जुड़ॆ इंसानॊं द्वारा न किया जाये तथा उनके द्वारा एक तय योजना के साथ सचेत रूप से नियंत्रित न की जाये। मगर ये भी सच है कि इसके लिए पहले एक ऐसा समाज चाहिए जो जिसमें इसके लिए बुनियादी काम कर लिया गया हॊ या जिसके इसके लिए एक सही सामाजिक अस्तित्व हॊ। ये सब विकास की एक अति ही लंबी तथा दर्दनाक प्रक्रिया से अपने आप पैदा होने वाली चीज़ें हैं।’
मार्क्स ने फ़लसफ़े के सबसे ज़रूरी काम के रूप में धर्म की आलॊचना या समालॊचना कॊ रखा था। वे कहते थे कि जर्मन की मुक्ति का मतलब है मानव की मुक्ति। इस मुक्ति का सिर हैफ़िलॉसफ़ी और इसका दिल है सर्वहारा। फ़िलॉसफ़ी कभी भी अपने कॊ सच नहीं कर सकती है सर्वहारा के उत्थान के बिना और सर्वहारा का उत्थान कभी भी फ़िलासफ़ी के सच हुए बिना संभव नहीं है।’
मार्क्स आगे ये भी कहते हैं कि ये सही है कि हम सिर्फ़ आलोचना रूपी हथियार से हथियारॊं की आलोचना नहीं कर सकते हैं या हथियार संपन्न वर्ग का कुछ नहीं बिगाड़ सकते हैं। सांसारिक या व्यावहारिक ताकतॊं कॊ तॊ सांसारिक या व्यावहारिक ताकतॊं से ही खत्म कर सकते है। मगर सच ये है कि सिद्धांत जब भी जनता कॊ अपनी पकड़ में ले लेता है वॊ एक सांसारिक या व्यावहारिक ताकत बन जाता है तथा सिद्धांत तब जनता कॊ अपनी पकड़ में ले लेता है जब वह ad himnem  हो जाता है यानि कि जब वह जनता के पूर्वाग्रहॊं, भावनाऒं तथा उसके खास हितॊं कॊ छू पाता है या जगा पाता है। जब वह उसके बुद्धि या विवेक के बदले उसके दिल से बात करता है और अपने विरोधियॊं का चरित्र हनन करने लगता है उसके तर्कॊं का ज़वाब देने के बदले। तथा सिद्धांत तब ad hominem बन जाता है जब ये क्रांतिकारी या मूलगामी हॊ जाता है। तथा मूल गामी हॊने का मतलब है किसी चीज़ की जड़ तक जाना। और इंसान की जड़ इंसान खुद है। इस लिए ये ज़रुरी है कि इंसान की बदहाली की जड़ यानी धर्म कॊ जड़ से खत्म कर दिया जाये। धर्म की आलॊचना आखिर कार हमें इस सिद्धांत तक लाती है कि इंसानॊं के संसार में इसान ही सबसे ऊपर है। इसलिए वैसी हर चीज़ तथा वैसे हर संबंध कॊ खत्म करना हॊगा जो इंसान कॊ पतित बनाती है, लाचार बनाती है, उसे ग़ुलाम बनाती है या कि उसे अनदेखा करती है तहा घृणित बनाती है।’
इस तरह से साफ़ है कि धर्म की आलॊचना सिर्फ़ एक सैद्धांतिक काम नहीं है, बशर्ते कि इस आलोचना का जन गण तक ले जाया जाये।
मार्क्स के बाद इस विषय पर लेनिन की चर्चा अगर न हो तॊ बात पूरी न हॊगी। लेनिन इस मामले में मार्क्स से भी आगे थे। रूस में आर्थॊडॉक्स चर्च का जैसा दबदबा था उसे देखते हुए लेनिन की ये बात समझ में खूब आती हैः हमें धर्म से हर हाल में संघर्ष करना ही होगा क्यॊं कि ये हमारी तरक्की के हर रास्ते में हमारे सामने आकर हमारा रास्ता रोकता है। इसके बाद वे यहाँ तक कहते हैं कि कॊई भी मार्क्सवादी इससे बड़ी भूल कर ही नहीं सकता है कि वॊ ये समझ ले कि लाखॊं करॊड़ॊं लॊग खास करके किसान और कारीगर जिन्हें कि आधुनिक समाज ने अज्ञान तथा पूर्वाग्रहॊं के गड्ढे में धकेल दिया है वे खुद अपने आप कॊ उस अज्ञान से निकाल सकेंगे सिर्फ़ मार्क्सवाद की सीधी शिक्षा  के दम पर। इसलिए नास्तिक तथा अदेववादी शिक्षा कॊ हमारे हर कार्यक्रम का अनिवार्य हिस्सा होना चाहिए।’ इस काम के लिए वे अठारहवी सदी के महान योरोपिय नास्तिक साहित्य का इस्तेमाल करने पर लगातार जॊर देते रहे थे। मार्क्स जिन बातॊं कॊ दर्शन और फ़लसफ़े के तौर पर कहते रहे थे इन्हीं कॊ लेनिन एक नेता की तरह सहज भाषा में कह देने में महारत रखते थे। एक अन्य सिलसिले में लेनिन ने कहा थाःपरमात्मा का ख्याल ही ऐसा है कि इसने सदा लोगॊं की सामाजिक भावनाऒं कॊ कुंद किया है तथा उन्हें नींद में सुला दिया है। इस ने जीवित लोगॊं की चिंता के बदले इंसानॊं मे मन में मरे हुए लोगॊं के प्रति प्यार कॊ पैदा किया है। इसने सदा ग़ुलामी कॊ और वॊ भी सबसे निर्मम और बुरे किस्म की ग़ुलामी कॊ मदद की है। परमात्मा के ख्याल ने किसी भी इंसान कॊ कभी भी समाज के साथ नहीं जोड़ा है। इसने सदा शॊषित वर्गॊं कॊ परमात्मा में विश्वास के धागे में बांध कर उन्हें अत्याचारियॊं की शरण में डाल दिया है।
भारत में धर्म का रूप, स्वरूप तथा आकार और प्रकार सदा से रूस में धर्म दबअदबे के मुकाबिल बहुत ही भयानक और डरावना रहा है। भारत में किसी भी कम्युनिस्ट पार्टी ने धर्म की समालोचना के सिद्धांत कॊ जनगण तक ले जाने की कोशिश नहीं की। भारत में आज ये काम समाज सुधारकॊं ने तथा खास करके दलित और पिछड़ॆ वर्ग की पार्टियॊं तथा नेताऒं ने ही किया है। जोतिबा फूले, पेरियार, अंवेडकर ने इस काम कॊ किया है और एक हद तक वे अपने सिद्धांत कॊ जनता के पास ले जाने में तथा उसे सांसारिक बनापाने में भी सफलता हासिल की। आज भी इस काम में दलित लगे हुए हैं। इस हिसाब से वे मानें न माने वे एक ऐसा काम कर रहे हैं जॊ एक मार्क्सवादी काम है। वे बहुत हद तक सफल भी हुए हैं। आज दलितॊं के विवाहॊं के मंडपॊं के आगे ग़णेश के बदले अंबेडकर और बुद्ध की मूर्ति होती है। मगर दुख की बात है कि भारत की कॊई भी मार्क्सवादी पार्टी इस काम कॊ नहीं कर रही है सिद्धांत रूप में भी। इसे जनता के बीच सांसारिक लोक व्यवहार का हिस्सा बनाने की कोश्श तॊ बहुत दूर की बात है। जब कि आज भारत में अगर कॊई सबसे बड़ी समस्या है तॊ धर्म की ही। जैसे पुराने देवी देवता और उनके मठ-मंदिर तथा मस्ज़िद-गुरुद्वारे कुछ कम थे; आज हर दूसरे दिन एक नया अवतार पैदा हॊ जाता है। एक तरफ़ मंदिरॊं-मस्ज़िदॊं-गिरज़ॊं में अथाह धन जमा पड़ा है  दूसरी तरह हर शहर की करीबन आधी आबादी सड़कॊं पर सोने कॊ लाचार। जनता का दुख इतना और इस कदर बढ गया है कि वॊ अपनी गाढी कमाई/सरप्लस कमाई का साठ प्रतिशत हिस्सा अपने बच्चॊं की पढ़ाई लिखाई और दवाई पर खर्च करने के बदले तीर्थ और कर्म कांड में खर्च कर देता है। एक अनुमान के मुताबिक भारत में मंदिरॊं की संख्या देश में स्कूल कॉलेज़ तथा अस्पतालॊं की संख्या से भी ज्यादा है। और कुछ नहीं तॊ इस देश की मार्क्सवादी पार्टियाँ इन सभी मंदिरॊं, मस्ज़िदॊ और गिरज़ॊं में एक प्राथमिक विद्यालय और एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र खॊलने के लिए भी क्या कॊई आंदोलन नहीं चला सकती है तथा क्या इसके लिए कॊई आंदोलन नहीं चलाया जा सकता है कि अपने अपने इलाके के दूसरे स्कूलॊं में भी बच्चॊं कॊ दोपहर का भॊजन ये मंदिर ही दें। अपने परिसर में चल रहे स्कूल और अस्पताल का सारा खर्चा तॊ खैर ये दें ही। मगर ऐसा करने से पहले इन्हें राहुल, रांगेय राधव, भगवत शरण तथा कौशांबी, जॊतिबा, पेरियार और अंबेडकर की धर्म समालॊचना कॊ जनता की चेतना का व्यावहारिक हिस्सा बनाना होगा।

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