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Britain’s new energy mix

Chris Case, ‎Bob Underwood, ‎Jesse Zuck Britain Now Generates Twice as Much Electricity From Wind as Coal, And That’s a Big Deal There’s no turning back now. GRANT WILSON & IAIN STAFFELL, THE CONVERSATION 8 JAN 2018 Just six years ago, more than 40 percent of Britain’s electricity was generated by burning coal. Today, that figure is just 7 percent. Yet if the story of 2016 was the dramatic demise of coal and its replacement by natural gas, then 2017 was most definitely about the growth of wind power. Ireland shares an electricity system with the Republic and is calculated separately), up from 10 percent in 2016. This increase, a result of both more wind farms coming online and a windier year, helped further reduce coal use and also put a stop to the rise in natural gas generation. Great Britain’s annual electrical energy mix 2017. (National Grid and Elexon) In October 2017, the combination of wind, solar and hydro generated a quarter of Britain’s electricity over the entire month, a new record helped by ex-hurricane Ophelia and storm Brian.Great Britain’s annual electrical energy mix 2017 per month. (National Grid and Elexon) Since that record month, large new offshore wind …

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हमारा संविधान

तुम जब भी हमारे संविधान का नाम लेते हॊ, संविधान का एक न एक पन्ना कम हो जाता है। तुम जब भी किताब ए अंबेदकरी कॊ थाम लेते हॊ, किताब ए अंबेदकरी का एक पन्ना बेदम हो जाता है।   तेरे मन वचन कर्म में न जाने कैसा जादू है, तू जिसे शाम कॊ रोके है, सुबह वही बेकाबू है, तुम जब भी ग़रीबी मिटाने कॊ कॊई दाम देते हॊ, कॊई न कॊई गरीब समूह बेचारा खतम हॊ जाता है। तुम जब भी हमारे संविधान का नाम लेते हॊ, संविधान का एक न एक पन्ना कम हो जाता है।   तेरे ज़लवॊं की बात कहूँ तॊ मैं क्या कहूँ सरकार, तेरे आगे आगे जयजयकार, तेरे पीछे है हाहाकार, तुम जब किसानॊं कॊ सलामती का सलाम देते हॊ, माँ भारती के दिल में एक नया ग़म हॊ जाता है। तुम जब भी हमारे संविधान का नाम लेते हॊ, संविधान का एक न एक पन्ना कम हो जाता है।   अरे बेमिसाल हैं तेरे रोज़ाना और मासिक फ़रमान, जिनके कफ़न में लिपट जाते हैं जन गण के अरमान, तुम जब भी उन सब की बेहतरी का पैग़ाम देते हॊ, मादरे हिंद का एक न एक सपना अधम हॊ जाता है। तुम जब …

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दिल्ली डायरी

Delhi Diary इस स्तम्भ की शुरुआत मैं एक नये तरीके से कर रहा हूँ। इस में मैं सबसे बाद में देखे या सुने कार्यक्रम का जिक्र सबसे पहले करूँगा।     सो इस सिलसिले में मैं शुरूआत सबसे पहले कल ही श्रीराम सेंटर में देखे गये एक नाटक से करना चाहता हूँ। (1) कल जिस नाटक कॊ मैंने देखा उसमें एक ही इंसान के खंड खंड व्यक्तित्व की कहानी है। इस कहानी का नाम द्रौपदी है। इसमें ऊपर से देखें तॊ एक भरा पूरा खुशहाल और एकल परिवार है। इसमें पति पत्नी और दो बच्चे है। समय के साथ जीवन के भीतरी बाहरी दबावॊं के कारण पति का व्यक्तित्व पाँच हिस्से में बंट जाता है। एक हिस्सा एक दवा कंपनी के मुलाज़िम का है। दूसरा हिस्सा एक शराबी का है। तीसरा हिस्सा एक ऐय्याश इंसान का है चौथा हिस्सा उस इंसान का है जॊ जीवन कॊ न्याय नीति के साथ जीना चाहता है। सबसे बुरी हालत इसी हिस्से की होती है। जब नायक अपने दफ़्तर में घॊटाला करता है तॊ उसका एक हाथ सड़ जाता है। ज्ब नायक अपनी कार से एक बच्चे कॊ कुचलने के बाद भाग जाता है तॊ उसकी एक पैर सड़ जाता है। जब उसकी प्रेमिका …

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