मुख्य पन्ना / 2015 / May (पन्ना 2)

मासिक आर्काइव: May 2015

अपने समाजवादी मित्रॊं के नाम एक पयाम

मुझे तॊ कभी भी अपना समझे ही नहीं तुम, अपना तो क्या अपने जैसा समझे ही नहीं तुम। हम तेरे लिए अन्न उगाते रहे, हम तेरे लिए धन बनाते रहे, तेरे काम में मन लगाते रहे, तेरी लिए अपना तन गलाते रहे हम कर सकते कॊई कल्पना समझे ही नहीं तुम। सदा तेरा ही कहा मानते रहे, तुझे अपना हितु जानते रहे अपना गुरू तुझे पहचानते रहे तेरा गुण हम बखानते रहे, हम देख सकते हैं कोई सपना समझे ही नहीं तुम। ज्ञान विज्ञान में तेरा नाम रहा, कला दर्शन में तेरा काम रहा, तेरे लिए सब बिन दाम रहा, हमें अक्षर तक सदा हराम रहा, हम कर सकते हैं कॊई अर्चना समझे ही नहीं तुम। हम ने तुझे शिव पारबती बनाया, कभी भगवान ओ भगवती बनाया, कभी लगती कभी भगती बनाया, कभी अंबर कभी जगती बनाया, पर हम कर सकते हैं सर्जना समझे ही नहीं तुम। तुमने तो हमें पशु कभी दास समझा, हमारे मेहनत, हुनर कॊ बकवास समझा, हमारे ज्ञान, गीत कॊ उपहास समझा, हमारे रहन सहन कॊ ह्रास समझा, हम भी कर सकते हैं गवेषणा समझे ही नहीं तुम। पर अब कुछ ही वर्षॊं के दरमियान, हमने साध लिया है वो सारा ज्ञान, जो तुम हज़ारॊं साल …

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तुम्हारा साम्यवाद देखा, तुम्हारा समाजवाद देखा

तुम्हारा साम्यवाद देखा, तुम्हारा समाजवाद देखा, हर जगह अपने चमन को तेरे हाथॊं बर्बाद देखा। तुमने जॊ कुछ भी कहा, तुमने जो कुछ भी किया, उसका लाभ तेरे पुर्वजॊं और तेरे अग्रजॊं ने लिया, गण के नाम पर हमने तेरे सुजन कॊ आबाद देखा। तुम्हारा साम्यवाद देखा, तुम्हारा समाजवाद देखा, हर जगह अपने चमन को तेरे हाथॊं बर्बाद देखा। तुमने जो कुछ भी लिखा, तुमने जो कुछ भी पढ़ा, उसमें सदा अपने ही सुख चैन का तिलस्म गढ़ा, तुझे कभी लंदन, कभी लाल किले में आज़ाद देखा, तुम्हारा साम्यवाद देखा, तुम्हारा समाजवाद देखा, हर जगह अपने चमन को तेरे हाथॊं बर्बाद देखा। तेरा खान पान, आन जान हो कि तेरा रहन सहन, सबमें तुम रहे सदा फ़िरंगियॊं के ही तॊ हम वतन, अनुरागी आखॊं से भी हमने तुझे सदा सैय्याद देखा, तुम्हारा साम्यवाद देखा, तुम्हारा समाजवाद देखा, हर जगह अपने चमन को तेरे हाथॊं बर्बाद देखा। फ़िर भी जॊ तुमने किया उससे हमें शिकायत नहीं, हमने जॊ भी पाया तेरी ही जूठन ओ रियायत रही, पढ़ना तॊ दूर, हमने पूरखॊं कॊ बस बीज-खाद देखा। तुम्हारा साम्यवाद देखा, तुम्हारा समाजवाद देखा, हर जगह अपने चमन को तेरे हाथॊं बर्बाद देखा। अब हमने तेरे सारे ढॊंग, पाखंड कॊ पहचान लिया, तेरे राज …

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अरे, रोको,रोको इस सत्ता के हाथ

अरे, रोको,रोको इस सत्ता के हाथ, जॊ न रोक सको तो काट दो। ये हरियाली का हनन करने आये, हमारे जल में ज़हर भरने आये अरे रोको इस सत्ता की सब बात, जॊ न रोक सकॊ तॊ काट दो। ये हवा में दूषन फैलाने वाले, इस धरती का खून बहाने वाले, अरे, रोको, इस सत्ता के घात, जो न रोक सकॊ तॊ काट दो। हमारी नदियॊं को रोकते जाते, ये परबतॊं को ये खोदते जाते, रोको रोको इस सत्ता के मात, जॊ न रोक सकॊ तो काट दो। इन्हॊंने बचपन कॊ अपह्रित किया, हमारे यौवन कॊ बलात्कृत किया, धरती नष्ट करता ये सत्ता विराट, इसे छांट दो, इसे काट दो। ये देशी विदेशी तस्कर दलाल, इनके रहते न बचेंगे राधा गोपाल, जो न रूक सकें ये सत्ता सम्राट, इन्हें मार दो, इन्हें काट दो। इन्हॊंने हमारे गाँवॊं को उजाड़ा है, हमको अपनी जड़ॊं से उखाड़ा है, रोको, रोको इस सत्ता के उत्पात जो न रोक सको तो उसे काट दो। इतिहास के हत्यारॊं में सबसे निर्मम, अब तक के लुटॆरों में सबसे अधम, जो रूक सके ये सत्ता अभिजात, इसे काट दो, इसे काट दो। ज़िंदगी में कॊई न कॊई कमी रहे, आखॊं में कुछ न कुछ नमी रहे। ज़रूरी …

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अपनी श्रीमती नीलम के लिए, शादी की चौबीसवीं सालगिरह पर

तुम्हारे साथ बसते बसाते, चौबीस साल कैसे बीत गये, हमें पता ही न चला। तुम्हारे साथ लड़ते लड़ाते, चौबीस साल बीत कैसे गये, हमें पता भी न चला। चाँद सितारे कहीं ज्यादा सुंदर हैं, धरती अंबर कहीं ज्यादा सुघड़ हैं, इन पे तुझ संग रिझते रिझाते, चौबीस साल कैसे जीत गये हमें पता ही न चला। फूलॊं के रंग में ज्यादा चमक है, पंछी के गीत में ज्यादा झनक है, इन्हें तुझ संग देखते दिखाते, चौबीस साल कैसे मीत भये, हमें पता ही न चला। ये नहीं कि हमें कष्ट नहीं था, पर हमें रोने का वक्त नहीं था, उन्हें तेरे संग सहते सहाते, चौबीस साल कैसे हित भये, हमें पता ही न चला। हवा में अब वैसा ज़हर नहीं, पानी में अब वैसा कहर नहीं, इन संग तेरे साथ बहते बहाते, चौबीस साल कैसे ऋत भये, हमें पता भी न चला। भूख अब वैसे मारती नहीं, प्यास अब वैसे काटती नही, इनसे तेरे संग जूहते जुझाते, चौबीस साल कैसे हृत भये, हमें पता भी न चला। दिल ओ दिमाग अब खाली नहीं, ज्ञान विज्ञान पहले सा ज़ाली नही, इन संग तेरे साथ चलते चलाते, चौबीस साल कैसे बीत गये, हमें पता भी न चला। घर कभी बाहर की समस्या …

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सरस्वती की पुकार

मेरी पुजा को नहीं फूल, मिठाई की दरकार पूजो तो पूजो मुझे पढ़ लिख के अबकी बार। पढ़ो तो ऐसे पढ़ो कि धरती की हरियाली बढ़े, अंबर अपने नीलेपन के सपने नित नये गढ़े, हर लड़का एक फूल बने, हर ल़ड़की अंगार। मेरी पूजा को नहीं फूल, मिठाई की दरकार पूजो तो पूजो मुझे पढ़ लिख के अबकी बार। लिखो तो इस बार लिखो ऐसा नया विधान, कि सुख चैन से जी सके जगती का हर इंसान कि हर मर्द बसंत बने, हर औरत बने बहार। मेरी पुजा को नहीं फूल, मिठाई की दरकार पूजो तो पूजो मुझे पढ़ लिख के अबकी बार। पढ़ लिख कर बनाओ अब ऐसा एक संसार, माथे हो नेह मुकुट सबके सीने न्याय गलहार, कि हर जगह विज्ञान खिले, ज्ञान करे गुंजार। मेरी पुजा को नहीं फूल, मिठाई की दरकार पूजो तो पूजो मुझे पढ़ लिख के अबकी बार।

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पैर के नीचे ज़मीन और सिर के ऊपर आसमान

पैर के नीचे ज़मीन और सिर के ऊपर आसमान, इस देश में तेरे के सिवा किसके पास है, महान ! मज़दूरॊं के पास न तॊ धन रहे, न विद्या, हो तो अब्रह्मण्य हॊ या ब्रह्म की अवज्ञा; ये तॊ तेरा ही रहा है सदा शाश्वत फ़रमान, इस देश में पैर तले धरती, सिर ऊपर आसमान, आपके सिवा किसके पास हो सकता है, श्रीमान। सारे जग को स्वच्छ, स्वस्थ रखने वालॊं को, अछूत कहा, शुद्र कहा मेहनत करने वालॊं को, तेरे पिघले सीसे का शिकार हमारा ज्ञान कातर कान फ़िर किसी पाँव तले भूमि, सिर पर आसमान, आपके अलावा किसके पास हो सकता है अपान। ज्ञान पिपासा ने हमें बनाया शंबूक कभी एकलव्य, इस मामले में तेरा इतिहास रहा सदा दिव्य-भव्य; हमारे दमन में तुमने ईश्वर तक से लिया श्रमदान तो किसी और के पैर-पास ज़मीन, सिर पास आसमान, इस देश में तेरे बग़ैर भला कैसे हो सकता है भगवान, सारे श्रुति स्मृति तेरे, नियम धरम सब तुम्हारा, खुद को भूदेव कहा, विष्णु तक को लात मारा, तेरी स्वार्थ पूर्ति किए सदा जग के नाथ ओ प्राण; फ़िर किसी के पैर के नीचे ज़मीन, सिर पे आसमान, तेरे बिना कैसे हों इस भरत खंड में, हे कल्याण। सारा सत्त तुम्हारा, सब …

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तुझे कैसे चैन आये है भगवान

तुझे कैसे चैन आये है भगवान, जॊ तेरे जन गण यूँ पशेमाँ हलकान। ये भूखे नंगे मारे फ़िरते सारे, जो तुझे हैं खुद से भी प्यारे, फ़िर तू कैसे हो गया अंतर्ध्यान। ठिठुरती अंधियारी रातॊं में, मर जाते बातॊं ही बातॊं में, क्या तू इससे भी है अनजान। तेरे मंदिरॊं में धन-साधन अपार, वे सकते सब का जीवन संवार, तू कैसे है निर्बल कॊ बलवान। तू दीनानाथ, तू दीन दयाल, फ़िर तेरे दीनॊं हीनॊं का ये हाल, क्या तुझे नहीं ज़रा भी भान। सब पंडित तेरे, सब ज्ञानी तेरे, पर जन गण को घेरे हैं अंधेरे, ये कैसा है तेरा धर्म ज्ञान।

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सबसे दोस्ती, सबसे प्यार

सबसे दोस्ती, सबसे प्यार, सबका है सारा संसार। धरती नित हरी भरी रहे, मृदुल मधुर बयार बहे, अंबर की कृपा रहे अपार उज्जल कज्जल हो नदी जल, मीठे पके हॊं सारे फल, सबकॊ मिले भरपेट आहार, सब फूल खिलें, सब दीप जलें, सबके सब सपने फूलें, फलें, सबके जीवन में आये बहार, सबके जीवन में रास रहे, दिल में मीत का बास रहे कलियॊं पर भौंरे करें गुंजार, ज्ञान विज्ञान का काम चले, नेह न्याय के अंज़ाम भले, सबको रहे ध्यान हर बार।

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