मासिक आर्काइव: December 2015

माघ पूस की रात खुले में सोते बेघर, बेदर, बेकल बच्चे

माघ पूस की रात खुले में सोते बेघर, बेदर, बेकल बच्चे। कैसे कहें इनके ईश्वर अल्लाह सबसे अच्छे, सबसे सच्चे।

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मारे मारे फिरते हैं बेकस बेकल इंसान

मारे मारे फिरते हैं बेकस बेकल इंसान, कैसे तेरे अल्लाह,खुदाया,परमपिता भगवान। इस कदर भूखे प्यासे जन औ माघ पुस की रात, हैवानॊं से भी गई बीती है मानुष की जात, देख कर इनकी हालत दुखी औ पस्त है शैतान।

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अपना देश बड़ा प्यारा देश

अपना देश बड़ा प्यारा देश, जिसकी लाठी उसी की भैंस। वैज्ञानिक बन गये हैं सब पाखंडी, विद्वान हो गया है हर हर शिखंडी, अब कौन किसकॊ रोके नरेश। अपना देश बड़ा प्यारा देश, जिसकी लाठी उसी की भैंस। साहित्यकार बन गये सब कायर, बुज़दिल हो गये हैं सारे शायर, कौन कहे कि राजा नग्न वेश। अपना देश बड़ा प्यारा देश, जिसकी लाठी उसी की भैंस। राजा का चल रहा है राज, जनता का गल रहा है ताज, फल रहा अनाचार निर्निमेष। अपना देश बड़ा प्यारा देश, जिसकी लाठी उसी की भैंस। भूखे को अन्न न प्यासे को पानी मूर्ख को ज्ञान न राजा को रानी, भारत माँ के दिल कॊ भारी ठेस। अपना देश बड़ा प्यारा देश, जिसकी लाठी उसी की भैंस। न्याय की आँखें अब चार चार, ऊँच नीच देखे है दीदे कॊ फाड़, न्याय देवी के रहे न वस्त्र शेष। अपना देश बड़ा प्यारा देश, जिसकी लाठी उसी की भैंस। न्याय-अन्याय की हो गई शादी, धन, धर्म, सत्ता की बढ़ी आबादी, जन की चिंता कौन करे जनेश। अपना देश बड़ा प्यारा देश, जिसकी लाठी उसी की भैंस। आऒ अब कुछ ऐसा यूँ करें, जिसकी भैंस हो वही लाठी धरे, तभी मिटेगा जन का क्लेश अपना देश बड़ा प्यारा …

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